शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

क्या प्रेम आमोद प्रमोद या मजा है ?

प्रेम क्या है ?  हम यह चर्चा नहीं कर रहे कि - प्रेम को क्या होना चाहिये ? हम यह देख रहे हैं कि - वो क्या है । जिसे हम प्रेम कहते हैं ? आप कहते हैं - मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ । पर मैं नहीं जानता कि आपका प्रेम क्या है ? मुझे संदेह है कि आप किसी भी चीज से प्यार प्रेम करते हों । क्या आप प्रेम शब्द का अर्थ भी जानते हैं ? क्या प्रेम आमोद प्रमोद या मजा है ? क्या प्रेम ईर्ष्‍या है ? क्या वह व्यक्ति प्रेम कर सकता है । जो महत्वाकांक्षी हो ? हो सकता है । वो अपनी पत्नी के साथ सोता हो । कुछ बच्चे भी पैदा कर लिये हों । एक व्यक्ति जो राजनीति में । या व्यापार जगत में । एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने के लिए संघर्ष रत हो । अथवा धार्मिक जगत में । जहां कि - वो एक संत बनना चाहता हो । जहां कि उसे इच्छा रहित होना है । यह सब महत्वाकांक्षाओं । आक्रामकता । इच्छाओं के ही अवयव हैं ।
क्या एक व्यक्ति जो कि प्रतियोगिता में । दौड़ में शामिल हो । वो प्रेम में हो सकता है ? और आप सब प्रतियोगिता में हैं । क्या आप नहीं ? अच्छे जाब । बेहतर पद प्रतिष्ठा । अच्छा घर । अधिक महान विचार । अपनी अधिक सुस्पष्ट छवि बनाने में लगे हैं । आप सब जानते हैं कि - आप इन सबसे गुजर ही रहे हैं । क्या यह सब प्रेम है ? क्या आप तब प्रेम कर सकते हैं । जब आप यह सब अत्याचार सम्पन्न करते गुजर रहे हों । जब आप अपनी ही पत्नि या पति या बच्चों पर प्रभुत्व जमा रहे हों ? जब आप ताकत या शक्ति की खोज में लगे हों ? तब क्या प्रेम की कोई संभावना बचती है ? तो जो जो प्रेम नहीं है । उस सबको नकारते अस्वीकार करते हुए हम जहां पहुंचते हैं । वो प्रेम होता है । आप समझे । श्रीमान ? आपको उस सबको अस्वीकार या नकारना होगा । जो प्रेम नहीं है । जो कि

महत्वाकांक्षा ना हो । प्रतियोगिता ना हो । क्रोध आक्रामकता ना हो । हिंसा ना हो । भले ही वो बोलचाल में हो । या आपके कृत्यों में या विचारों में । जब आप उस सबको अस्वीकार नकार देंगे । जो प्रेम नहीं है । तब आप जानेंगे कि - प्रेम क्या है ?
क्या क्षमा प्रेम है ? क्षमा में क्या परिलक्षित होता है ? आपने मेरा अपमान किया । और मैं गुस्सा या नाराज हो गया । मैंने कहा - मैं तुम्हें माफ करता हूँ । पहले तो ” मैं “ ने अपमान को ध्यान में ले लिया । स्वीकार लिया । लेकिन बाद में मेरे ” मैं “ ने उसे अस्वीकार कर दिया । इसका मतलब क्या है ? ” मैं “ ही केन्द्रीय छवि हूं । यानि ” मैं “ वो हूं । जो किसी को क्षमा कर रहा है । जब तक क्षमा कर देने का मनो भाव रहता है । तब तक मैं महत्वपूर्ण रहता है । ना कि वो व्यक्ति जिसने मेरा अपमान किया । तो तब जबकि पहले तो मैं क्रुद्ध हो जाऊं । गुस्से का अम्बार लगाऊं । और फिर उसे इंकार अस्वीकार करूं । जिसे आप क्षमा करना कह रहे हैं । यह प्रेम नहीं है । एक व्यक्ति जो प्रेम में है । जाहिर है । उसमें शत्रु भाव होगा ही नहीं । इसलिए मान अपमान जैसी सभी चीजों के प्रति वो एक साथ तटस्थ उदासीन होगा । सहानुभूति । क्षमाशीलता । कब्जा जताने वाले । या आधिपत्य सूचक सम्बंध । ईर्ष्या । और भय । यह सब चीजें प्रेम नहीं हैं । यह सब मन हैं । क्या ऐसा नहीं है ?
स्पष्टतः प्रेम भावुकता नहीं है । कपोल कल्पनाओं में होना । या भावुक हो जाना । प्रेम नहीं है । क्योंकि ख्यालीपन और भावुकता । ये संवेदनाएं । अनुभूतियाँ । उत्तेजनाएं मात्र हैं । एक धार्मिक व्यक्ति जो ईसामसीह या कृष्ण का नाम लेकर रो रहा हो । या अपने गुरू का । या किसी अन्य का । वो केवल कल्पनाओं में में बह रहा । या भावुक मात्र है । वह उत्तेजनाओं में मग्न है । संवेदना या उत्तेजना । विचार की प्रक्रिया है । और विचार प्रेम नहीं है । विचार संवेदना का परिणाम है । तो वो जो भावुक व्यक्ति है । जो भावनाओं में बह रहा है । प्रेम नहीं जान सकता । क्या हम ख्यालों और भावुकता से भरे नहीं हैं ? ख्यालों भावों में बह जाना । आत्म अहं विस्तार का ही एक रूप है । जो ख्यालों में ही रह रहा हो । वो स्पष्टतः प्रेम में नहीं हो सकता । क्योंकि यदि एक ख्याली व्यक्ति की कल्पनाओं को प्रत्युत्तर नहीं मिलता । तो बहुत ही क्रूर व्यक्ति हो सकता है । यदि उसकी कल्पनाओं को को बह निकलने की जगह

नहीं मिलती । तो वह बहुत ही क्रूर हो सकता है । एक भावुक व्यक्ति को नफरत । युद्ध । और नर संहार के लिए भड़काया उकसाया जा सकता है । एक व्यक्ति जो अपने नाजुक ख्यालों में बह रहा है । अपने धर्म के लिए आंसुओं से भरा हुआ है । निश्चित ही उसके पास प्रेम नहीं होता ।
हम अपनी इच्छाओं के लिए पागल हुए जाते हैं । हम अपने आपको इच्छा द्वारा तुष्ट करना चाहते हैं । लेकिन हम यह नहीं देखते कि - वैयक्तिक सुरक्षितता की इच्छा । व्यक्तिगत उपलब्धि । सफलता । शक्ति । व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आदि इन इच्छाओं ने इस संसार में क्या कहर बरपाया हुआ है । हमें यह अहसास तक नहीं है कि - हम ही उस सबके जिम्मेदार हैं । जो हम कर रहे हैं । अगर कोई इच्छा को । उसकी प्रकृति को समझ जाये । तो उस इच्छा का स्थान या मूल्य ही क्या है ?  क्या वहां इच्छा का कोई स्थान है । जहां प्रेम है ? या जहां इच्छा हो । क्या वहां प्रेम के लिए कोई जगह बचती है ?
प्रेम के बिना आप नैतिक नहीं हो सकते । वास्तव में आपके पास प्रेम है ही नहीं । आपके पास खुशी या मजा है । उत्तेजना या रोमांच है । यौन संबंध हैं । उसी तरह जैसे कि - एक परिवार है । पत्नि या पति है । जिस तरह देश से जुड़ाव है । लेकिन ये जुड़ाव सा सम्बंध प्रेम नहीं । और प्रेम कुछ ऐसा नहीं कि - बहुत दिव्य हो । या अपवित्र चीज हो । प्रेम में विभाग या भेद है ही नहीं । प्रेम का मतलब है । कुछ ऐसा । जिसका आप ध्यान रखें । खयाल रखें । जैसे किसी वृक्ष की देखभाल । संरक्षण । या पड़ोसी का ध्यान या खयाल रखना । या अपने ही बाल बच्चों की देखभाल । और ख्याल रखना । यह ध्यान रखना कि - आपका बच्चे को उचित शिक्षा मिले । यह नहीं कि स्कूल भेज दिया । और भूल गये । उचित शिक्षा का मतलब ये भी नहीं कि उसे बस तकनीकी शिक्षा दी जाये । यह भी देखना कि बच्चे को

उचित सही शिक्षक मिले । सही भोजन पानी मिले । बच्चा जीवन को समझे । सैक्स को समझे । बच्चे को केवल ऐसी शिक्षा देना । जिसमें वे भूगोल । गणित या तकनीकी चीजें सीख ले । जो उसको काम धंधा दिलाने में काम आयें । ये प्रेम नहीं है ।
प्रेम के बिना आप नैतिक नहीं हो सकते । हो सकता है । आप सम्मानीय हो जायें । समाज के अनुरूप हो जायें कि - आप चोरी नहीं करेंगे । पड़ोसी की पत्नी को लाईन नहीं मारेंगे ? आप यह नहीं करेंगे । वो नहीं करेंगे । लेकिन यह नैतिकता नहीं है । यह शील या सद्गुण नहीं है । यह केवल सम्मानीयता के अनुरूप होना है । आदर सम्मान धरती पर सबसे भयानक और घृणित चीज है ? क्योंकि ये बहुत ही कुरूप चीजों पर पर्दा डालता है । जहां पर प्रेम होता है । वहां पर ही नैतिकता होती है । जहां पर प्रेम हो । वहां आप जो भी करें । वो नैतिक होता है । जे. कृष्णमूर्ति

मैं कर्म में विश्वास नहीं करता ?

निश्चित ही जो खुद को सांसारिक राजनीति में खपा कर खो चुके हैं । उनके लिये खुद को भीड़ से अलग करना ही समस्या नहीं । अपितु जीवन में वापस लौटना । प्रेम में उतरना । सहज सरल होना भी मुख्य कार्य है । प्रेम के बिना आप कुछ भी करें । आप कर्म की सम्पूर्णता को नहीं जान सकते । अकेला प्रेम ही आदमी को बचा सकता है । यही सत्य है । श्रीमान ! हम लोग प्रेम में नहीं है । हम वास्तव में उतने सहज सरल नहीं रह गये हैं । जितना हमें होना चाहिए क्यों ? क्योंकि आप दुनियां को सुधारने । संवारने । जिम्मेदारियों । प्रतिष्ठा । सामने वाले से कुछ हटकर करने से । कुछ विशेष होने से सरोकार रखे हुए हैं । दूसरों के नाम पर आप अपने स्वार्थों के गर्त में डूबे हैं । आप अपने ही घोंघेनुमा कवच में समाए हैं । आप समझते हैं कि - आप ही इस सुन्दर संसार का केन्द्र हैं । किसी वृक्ष । किसी फूल । या बहती हुई नदी को देखने के लिए आप कभी भी नहीं ठहरते । और अगर कभी ठहर भी जाते हैं । तो आपकी आंखों में मन में चलते हुए कई विचार । स्मृतियाँ । और जाने क्या क्या उतर आता है । बस आपकी आंखों में सौन्दर्य और प्रेम ही नहीं उमड़ता । पुनश्च - यही सत्य है । लेकिन एक व्यक्ति के करने के लिये क्या है ? बस देखें । समझें । और सहज सरल रहें ?
अनुभव की भूख । या तृष्णा ही । भृम का । माया का । आरंभ है । जैसा कि अब आप जानते हैं । आपकी दृष्टि । आपकी पृष्ठ भूमि । या अतीत का प्रेक्षण । या अनुमान है । या परिस्थितियों द्वारा संभावनाओं को देखना है । और यह ही वह अनुमान या संभावनाएं हैं । जो आपने अनुभव किये हैं । निश्चित ही यह ध्यान नहीं हैं । ध्यान का आरंभ वहां से होता है । जब आप अपनी पृष्ठ भूमि । अपने आपको समझना शुरू करते हैं । बिना अपनी पृष्ठ भूमि को । बिना अपने आपको समझे । आप जिसे ध्यान कहते हैं । वो चाहे कितना ही आनंददायक या दुखदायक हो । वो आत्म सम्मोहन है । आप आत्म नियंत्रण का अभ्यास करते हैं । विचारों में महारत हासिल करते हैं । और

अनुभवों में आगे बढ़ने के लिए ध्यान केन्द्रित करते हैं । यह आत्म स्व केन्द्रित धंधा है । यह ध्यान नहीं है । और यह देखना जानना कि - क्या ध्यान नहीं है । यह ही ध्यान का आरंभ है । झूठ के सच को देख लेने पर ही । मन असत्य से मुक्त होता है । झूठ से मुक्त होने की आकांक्षा से ही झूठ से आजादी नहीं मिल जाती । यह मुक्ति तब आती है । जब हमें किसी सफलता । किसी निर्णय । परिणाम या अंत को उपलब्ध हो जाने से सरोकर नहीं होता । सारी खोजों पर विराम होने पर ही वह संभावना होती है कि - वो अस्तित्व में आये । जो अनाम है ।
केवल एक ही बात मायने रखती है । वो है - भलाई । प्रेम । बुद्धिमानी इत्यादि अमल में आये । कर्म भी हो । क्या भलाई वैयक्तिक और सामूहिक होती है ? क्या प्रेम वैयक्तिक और अवैयक्तिक होता है ? क्या बुद्धिमानी मेरी या तुम्हारी या और किसी की होती है ? यदि यह मेरी या तुम्हारी है । तो यह बुद्धिमानी या प्रेम या भलाई नहीं । यदि भलाई वैयक्तिक और सामूहिक रूप से किसी विशेष प्राथमिकता या निर्णय की तरह हो । तो वह भलाई नहीं रह जायेगा । भलाई वैयक्तिक्ता या सामूहिकता के नाम पर घर के पिछवाड़े में फेंक देने जैसी चीज नहीं है । भलाई । वैयक्तिता । या सामूहिकता । इन दोनों से स्वतंत्र रहकर फूलती फलती है ।
जब आप अवलोकन करते हैं । सड़क पर धूल देखते हैं । यह देखते हैं कि राजनीतिज्ञ कैसा व्यवहार कर रहे हैं । अपनी पत्नि के प्रति । अपने बच्चों के प्रति । अपना ही बर्ताव देखते हैं । इसी तरह की अन्य बातें । तो यही रूपान्तरण होता है । क्या आप समझे ? अपनी दिनचर्या को तरतीब देना । कार्यों में स्वरों को साध लेने सा सामन्यीकरण ही रूपान्तरण है । कुछ ऐसा नहीं । जो बहुत ही असामान्य । या जो दुनिया के बाहर की बात हो । जब कोई - स्पष्ट रूप से कुछ नहीं देख पाता । और वह तर्क युक्ति संगत रूप से इसके प्रति जागरूक हो जाता है । 


और इसे बदलता है । अपनी आदत को तोड़ता है । अपनी अस्पष्टता को विराम देता है । यही रूपान्तरण है । यदि आपको ईर्ष्या या जलन हो रही है । तो इसे देखें । इसे फूलने फलने का मौका दिये बिना इसे तुरन्त बदलें । यह रूपान्तरण होगा । जब आपको लोभ । हिंसा । महत्वाकांक्षा पकड़ लेते हैं । या जब आप खुद को किसी पवित्र आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह बनाना चाहते हैं । तो यह देखें कि आपकी ऐसी सोच । आपका ऐसा होना । कितनी निरर्थक दुनियां की रचना कर रहा है । मुझे नहीं पता । आप इस सबके प्रति जागरूक हैं । या नहीं । प्रतियोगिता विश्व का विनाश कर रही है । दुनियां रोज ब रोज अधिकाधिक प्रतियोगी होती जा रही है । अधिकाधिक आक्रामक होती जा रही है । और अगर आप अपनी यह प्रवृत्ति तुरन्त बदलते हैं । तो यह रूपान्तरण है । यह आप इस समस्या में बहुत गहराई तक जाएं । तो आप स्पष्टतः पाएंगे कि - विचार प्रेम को नकारता है । इसलिए किसी को भी यह प्रश्न उठाना चाहिए । तलाश या पता करना चाहिये कि - क्या विचार का अन्त हो सकता है ? क्या समय का अन्त हो सकता है ? हमें इन प्रश्नों पर दार्शनिक अंदाज में मुद्राएं नहीं बनानी हैं । इस पर चर्चाएं बहसें नहीं करनी । पर यह ईमानदारी से पता करना है । वास्तव में सच्चे रूप में । यही रूपान्तरण है । जब आप रूपान्तरण की गहराई में जाते हैं । तो आप पाएंगे कि - रूपान्तरण का मतलब है - किसी भी तरह के कुछ होने । तुलना के विचार का अभाव । यह है । अस्तित्व का पूर्णतया ना कुछ हो रहना ।
जबकि सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है । तो आप किसी अन्य आदमी का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं ? अपने आपका अध्ययन करें । आप ही सारी मानवता हैं । वृहत दूरूहपन । द्वंद्वात्मकता । अत्यंतिक संवेदना आप ही हैं । आप इस बात का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं कि - कोई अन्य आदमी के बारे में क्या कहता है । और

आप ही तो हैं । जो अन्य आदमी से संबंधित हैं । यही तो समाज है । आपने ही तो यह भयावह । कुरूप दुनिया गढ़ी है ? जो अब पूरी तरह अर्थहीन होती जा रही है । यही तो वजह है कि दुनियां भर के युवा विद्रोही हो रहे हैं । मेरे लिये यह एक अर्थहीन जीवन है । आदमी ने जो यह दुनियां गढ़ी है । उसकी अपनी ही मांगों का निक्षेप या फल है । उसकी अपनी - तुरन्त चाहिये । तात्कालिक प्राथमिकताओं । आदतों । महत्वाकांक्षाओं । लाभ । और ईर्ष्या का निचोड़ है । आप सोचते हैं कि आप मानव के संबंध में सभी पुस्तकों का अध्ययन कर लेंगे । और समाज में जाएंगें । तो आप अपने आपको समझ सकेंगे । लेकिन क्या यह ज्यादा सरल और सहज नहीं है कि - आप अपने से ही शुरूआत करें ?
जब मैं अपनी तुलना अन्य लोगों से नहीं करता । तब मैं समझ सकता हूं कि - मैं क्या हूँ ? जीवन भर । बचपन से । स्कूल उमृ से लेकर । हमारे मरने तक । हमें सिखाया जाता है कि - हम अपनी तुलना अन्य लोगों से करें । जबकि जब भी मैं किसी से अपनी तुलना करता हूँ । तो मैं अपने आपको ही नष्ट कर रहा होता हूँ । स्कूल में । एक साधारण स्कूल में भी । जहाँ कई लड़के होते हैं । उनमें जो कक्षा में मानीटर है । वह असल में क्या है ? आप लड़के को नष्ट कर रहे हैं । यही सब हम जिन्दगी भर करते हैं । तो अब क्या हम बिना तुलना किये जी सकते हैं । बिना अन्य किसी से भी तुलना किये ? इसका मतलब है । अब कुछ भी ऊंचा या नीचा नहीं होगा । अब ऐसा नहीं होगा कि - आपकी नजर में कोई एक श्रेष्ठ हो । उच्च हो । और कोई एक - हीन और निकृष्ट । आप वास्तव में वही हैं । जो कि आप हैं । और - जो आप हैं ? उसे जानने के लिए यह तुलना करने का तरीका आपको छोड़ना होगा । यह प्रक्रिया अनिवार्यतः समाप्त करनी होगी । यदि मैं हमेशा अपने को किसी संत । या किसी शिक्षक । या किसी बिजनेस मेन । लेखक । कवि । या अन्य लोगों से तुलना में रखूँ । तो मेरे साथ क्या होगा ? मैं क्या कर रहा हूं ? मैं इनसे तुलना कर रहा हूं । कुछ पाने के अनुकृम में । किसी उपलब्धि की दिशा में । या कुछ होने के चक्कर में । और यदि मैं किसी से अपनी तुलना नहीं करता । तो तब मैं यह जानना शुरू करता हूं कि - वास्तव में मैं क्या हूँ ? मैं क्या हूँ ? यह जानने की शुरूआत अधिक मोहक है । ज्यादा रूचिकर है । और अपने को जानना । सभी मूर्खता पूर्ण बेवकूफी भरी तुलनाओं के पार ले जाता है ।
अपने आपको जानने समझने के लिए । धैर्य । सहनशीलता । जागरूकता चाहिये । क्योंकि हमारा स्व या आत्म अनेक खण्डों वाले महा गृन्थ के समान है । जो केवल एक ही दिन में नहीं पढ़ा जा सकता । लेकिन यदि आप पढ़ना शुरू करें । तो आपको इसका प्रत्येक शब्द । प्रत्येक वाक्य । प्रत्येक पैराग्राफ । अपरिहार्य रूप से पढ़ना चाहिये । क्योंकि इसके प्रत्येक शब्द । वाक्य । और प्रत्येक पैराग्राफ में आपकी सम्पूर्णता के बारे में इशारे हैं । इसकी शुरूआत ही इसका अंत भी है । यदि आप जानते हैं कि - कैसे पढ़ा जाता है ? तो आप परम ज्ञान । परम समझदारी पा सकते हैं ।
वो चाहे खुशगवार हों । या पीड़ाजनक । अपने आपको जागृत रखने के लिए हम अनुभवों पर निर्भर रहते हैं । किसी भी प्रकार की चुनौती हो । हम अपने आपको जागा हुआ रखना चाहते हैं । जब कोई यह सच जान जाता है कि - चुनौतियों और अनुभवों पर निर्भरता । दिमाग को केवल और ज्यादा कुंद या जड़ बनाती है । और यह निर्भरता । हमें जागे रहने नहीं रहने देती । जब कोई यह समझ जाता है कि - हमने हजारों युद्ध लड़ें हैं । और एक बात भी नहीं सीखी कि हम अपने पड़ोसी को कल किसी क्षणिक सी उत्तेजना पर कत्ल कर सकते हैं । तब कोई कह सकता है कि - जागे जागृत रहने के लिए यह अनुभव और चुनौतियों पर निर्भरता हम क्यों चाहते हैं ? और क्या यह संभव है कि बिना किसी चुनौती के हम होश पूर्ण । जागृत । जागे रह सकें ? यह ही मुख्य असली प्रश्न है । हम चुनौतियों । अनुभवों पर यह सोच कर निर्भर रहते हैं कि ये हमें रोमांच । ज्यादा जिन्दापन । और ज्यादा त्वरितता देंगे । इनसे हमारा दिमाग और तेज होगा । पर इनसे ऐसा नहीं होता । तो यदि संभव हो । तो मैं अपने आपसे कहूं । सम्पूर्ण रूप से जागृत । सचेत । होश पूर्ण के लिए । आंशिक या टुकड़ों में नहीं । या अपने अस्तित्व के कुछ बिन्दुओं पर ही नहीं । पर पूरी तरह जागृति । क्या बिना किसी चुनौती के । बिना किसी अनुभव के द्वारा । इसका मतलब ये भी है कि क्या मैं खुद ही प्रबुद्ध हो सकता हूँ ? खुद को ही जगाये रह सकता हूँ । बिना किसी बाहरी प्रकाश पर निर्भर हुए ? इसका मतलब यह नहीं है कि - यदि मैं किसी संवेदना उत्तेजना पर निर्भर नहीं रहकर । निरर्थक हो रहूंगा । क्या मैं कोई ऐसी रोशनी हो सकता हूँ ? जो बाह्य उन्मुखी ना हो ? यह सब जानने समझने के लिए हमें अपने में ही बहुत गहरे जाना होगा । मुझे खुद को ही पूरी तरह जानना होगा । सम्पूर्णत अपने भीतर का एक एक कोना मेरा जाना समझा होना चाहिये । कोई भी ऐसा कोना नहीं होना चाहिए । जो दबा ढंका, छिपा या रहस्यपूर्ण हो । सब कुछ खुला होना चाहिए । हमें अपने स्व । अपनत्व के । हमारे पन के । सम्पूर्ण क्षेत्र के । प्रति जागृत होना चाहिये । जो कि हमारी वैयक्तिता और हमारी सामाजिकता की चेतना है । यह जागरण केवल तब हो सकता है । जब हमारा मन । वैयक्तिक और सामाजिक चेतना की परिधि के पार जाये । तभी कोई संभावना है कि - कोई अस्तित्व स्वतः प्रबुद्ध हो सके । और बाह्य उन्मुखी न हो ।
वास्तव में इस तरह की कोई चीज नहीं । जिसे कि हम कर्म कहते हैं ? कारण और प्रभाव । दो अलग या भिन्न चीजें नहीं हैं । आज का प्रभाव ही । कल का कारण है । ऐसा कोई अलग थलग पड़ा हुआ । कारण जैसा कुछ ? नहीं होता । जो प्रभाव पैदा करे । कारण और प्रभाव अंतः संबंधित हैं । कारण और प्रभाव के नियम । जैसी कोई चीज वास्तव में नहीं होती । जिसका मतलब यह भी है कि - ऐसी भी कोई चीज नहीं होती । जिसे कर्म कहें । हमारे लिये । कर्म का मतलब है । एक परिणाम । जिसके पीछे पहले कोई कारण रहा हो । पर प्रभाव और कारण के बीच के अन्तराल में जो होता है । वो है - समय । इस समय अन्तराल में अनन्त प्रकार के भारी बदलाव होते रहते हैं । जिससे हमें हर बार एक सा ही प्रभाव प्राप्त नहीं होता । और प्रभाव निरंतर नये कारण पैदा करते रहते हैं । जो कि मात्र प्रभाव का परिणाम ही नहीं होते । अतः यह ना कहें कि - मैं कर्म में विश्वास नहीं करता ? हमारा यह सब कहने का यह दृष्टिकोण नहीं है । कर्म का आशय है । बहुत ही सहज रूप से । एक ऐसा कृत्य । जिससे एक परिणाम भी जुड़ा हुआ है । और यह परिणाम पुनश्च । एक कारण की तरह भी है । यदि आम की गुठली को देखें । उसमें आम का वृक्ष होना निहित है । लेकिन मानव मन के साथ ऐसा ही कुछ नहीं है । मानव मन में अपने आप में रूपान्तरण और तत्काल समझ बूझ की सामर्थ्य । उसे किसी भी कारण से हमेशा अलग रख सकती है । जे. कृष्णमूर्ति

अकेले रहने में ही असली और अनन्त शक्ति है

केवल अबोधता निर्दोषता ही चाव पूर्ण और शौकिया हो सकती है । निर्दोषता के पास ही दुख नहीं होता । ना रोग बीमारी । हालांकि उसके पास इनके हजारों अनुभव होते हैं । अनुभव मन को भृष्ट नहीं करते । लेकिन वो जो पीछे छोड़ जाते हैं । अवशिष्ट । खरोंचे । और यादें । इनसे मन भृष्ट होता है । यह सब एक के ऊपर एक जमते जाते हैं । और तब शुरू होता है - दुख । यह दुख । समय होता है । जहां समय हो । वहां निर्दोषता सरलता नहीं होती । चाव । शौक से दुख पैदा नहीं हो सकता । दुख अनुभव है । अनुभव प्रतिदिन के जीवन का । पीड़ा से भरे जीवन । और क्षणिक सुखों के अनुभव । भयों और निश्चितताओं के अनुभव । आप अनुभवों से पलायन नहीं कर सकते । उनसे बच नहीं सकते । लेकिन इनकी जड़ें आपके मन में गहरे घर कर जायें । इसकी आवश्यकता भी नहीं है । इनकी जड़ें ही अन्य समस्याओं । वैषम्यताओं । द्वंद्वों और निरंतर संघर्षों को पालती पोसती हैं । इनसे बाहर आने का कोई उपाय नहीं है । सिवा इसके कि आप रोज ब रोज । कल आज कल की तरह मरते जायें ।  केवल और अकेला स्पष्ट मन ही शौक और चाव से भरा हो सकता है । बिना शौक और चाव के आप पत्तों पर जमी ओस और पानी पर पड़ती सूर्य की किरणों को नहीं देख सकते । मन की मौज । शौक । और चाव के बिना प्रेम भी नहीं होता ।
बिना किसी से जुड़े या बंधे हुए और निडर होकर । इच्छा को समझ कर उससे मुक्त रहने ।  इच्छा । जो कि भृमों की जननी है । उससे मुक्त रहने में आजादी है । अकेले रहने में ही असली और अनन्त शक्ति है । ज्ञान से ठुंसा हुआ । बंधनों में जकड़ा । नियोजित दिमाग कभी भी अकेला नहीं होता । जो धार्मिक । या वैज्ञानिक । या तकनीकी रूप से नियोजित हो । वह सदैव सीमित होता है । सीमितता ही द्वंद्व का मुख्य घटक है । इच्छाओं में जकड़े आदमी के लिये सौन्दर्य एक खतरनाक चीज है ।
किसी मनुष्य की मौत से अलग । अंततः किसी पेड़ की मौत । बहुत ही खूबसूरत होती है । किसी रेगिस्तान में एक मृत वृक्ष । उसकी धारियों वाली छाल । सूर्य की रोशनी और हवा से चमकी हुई उसकी देह । स्वर्ग की ओर उन्मुख नंगी टहनियां । और तने । एक आश्चर्यजनक दृश्य होता है । एक सैकड़ों साल पुराना विशाल पेड़ बागड़ बनाने । फर्नीचर या घर बनाने । या यूं ही बगीचे की मिट्टी में खाद की तरह इस्तेमाल करने के लिए मिनटों में 


काट कर गिरा दिया जाता है । सौन्दर्य का ऐसा साम्राज्य मिनटों में नष्ट हो जाता है । मनुष्य चरागाह । खेती और निवास के लिए बस्तियां बनाने के लिए जंगलों में गहरे से गहरे प्रवेश कर उन्हें नष्ट कर चुका है । जंगल और उनमें बसने वाले जीव लुप्त होने लगे हैं । पर्वत श्रंखलाओं से घिरी ऐसी घाटियां जो शायद धरती पर सबसे पुरानी रही हों । जिनमें कभी चीते । भालू और हिरन दिखा करते थे । अब पूरी तरह खत्म हो चुके हैं । बस आदमी ही बचा है । जो हर तरफ दिखाई देता है । धरती की सुन्दरता तेजी से नष्ट और प्रदूषित की जा रही है । कारें और ऊंची बहुमंजिला इमारतें ऐसी जगहों पर दिख रही हैं । जहां उनकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी । जब आप प्रकृति और चहुं और फैले वृहत आकाश से अपने सम्बन्ध खो देते हैं । आप आदमी से भी रिश्ते खत्म कर चुके होते हैं ।
प्रश्न - आपने हमें बताया कि - अपने दैनिक जीवन में गतिविधियों कार्य व्यवहार का अवलोकन करें । लेकिन वह क्या या कौन सा अस्तित्व है ? जो यह तय करेगा कि किसका अवलोकन करना है । और कब ? कौन तय करेगा कि उसे अवलोकन करना चाहिये ?
कृष्णमूर्ति - क्‍या आपने तय किया है कि - अवलोकन करना है ? या आप केवल अवलोकन कर रहे हैं ? क्या आपने

यह फैसला लिया । तय किया है । और कहा है कि - मैं अवलोकन करने और सीखने जा रहा हूँ ? तब वहां प्रश्न हो सकता है कि - कौन तय कर रहा है ? तब वहां पर कहा ये जा रहा है कि - मैं जरूर करूंगा ? और जब वह असफल रहता है । तब वह अपने आपको दंडात्मक भाषा में बार बार कहता है - मैं करूंगा ही । मुझे करना ही है । तब वहां पर संघर्ष होता है । तो मन मस्तिष्क की वह अवस्था जब - अवलोकन करना फैसला लिया । जाकर तय किया जाता है । वह कतई । कहीं से भी अवलोकन नहीं है । आप सड़क पर चले जा रहें है । और आपके बगल से गुजरा । आपने उसे देखा । और और खुद से कहा - कैसा गंदा है वह ? कैसी बदबू मार रहा है ? मैं कामना करता हूं कि - वह ऐसा और वैसा ना हो ।
जब आप अपने बगल से गुजरने वाले पर अपनी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहते हैं । जब आप इस बात के प्रति जागरूक रहते हैं कि - आप कोई फैसला दे रहें हैं । आलोचना कर रहें । या किसी चीज को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहें हैं । तब आप अवलोकन कर रहे हैं । तब आप यह नहीं कहते कि मुझे फैसला नहीं करना है । मुझे न्यायोचित नहीं ठहराना है । जब कोई आपकी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक होता है । तब किसी तरह का निर्णय नहीं होता । आपने देखा होगा किसी ने कल आपकी बेइज्जती की । तुरन्त आपकी मांसपेशियां फड़कने लगती हैं । आप असहज और गुस्सा हो सकते हैं । आप उसे नापसंद करना शुरू कर देते हैं । तो उस नापसंदगी के प्रति जागरूक रहना है । उन सारी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहें । यह फैसला ना करें कि - आपको अवलोकन करना है । अवलोकन करें । उस अवलोकन में कोई भी अवलोकन कर्ता नहीं होता । ना ही - अवलोक्य.. यानि देखने वाला । और - देखा 


जा रहा.. अलग नहीं होते । तब केवल अवलोकन मात्र ही होता है । अवलोकन कर्ता तब पैदा होता है । जब आप अवलोकन में हेर फेर या जोड़ना घटाना शुरू करते हैं । देखे गये को इकट्ठा कर उस पर नियंत्रण या कब्जा करने की कोशिश करते हैं । जब आप कहते हैं । वह मेरा मित्र है । क्योंकि वह मुझे प्रसन्न करता है । या वह मेरा मित्र नहीं है । क्योंकि उसने मेरे बारे में बुरा गंदा कहा । या आपके बारे में कुछ सच ही कहा । जो आप पसंद नहीं करते । तो अवलोकन को जमा । इकट्ठा । या संग्रह करने वाला । उसमें हेर फेर की गुंजाइश रखने वाला ही अवलोकन कर्ता है । जब आप बिना संग्रह करने । या बिना हेर फेर की इच्छा के अवलोकन करते हैं । तब कोई भी फैसला या निर्णय नहीं करते । आप सारा समय यही करते हैं । इस अवलोकन में निसर्गतः प्राकृतिक रूप से विशेष निश्चित निर्णय प्राकृतिक परिणाम के रूप में आतें हैं । पर यह वह निर्णय नहीं होते । जो अवलोकन कर्ता । अवलोक्य । या अवलोकन को इकट्ठा । जमा या संग्रह कर । उन पर नियंत्रण या कब्जा कर । या उनमें हेर फेर कर करता है । जे. कृष्णमूर्ति

आप आत्म विश्वास पा सकते हैं

क्या कोई ऐसा खोजी है । कोई ऐसा प्रश्न कर्ता है । जो अपने बारे में अन्य लोगों द्वारा दी गई सारी सूचनाओं । सारे ज्ञान को पूर्णतः त्याग कर । अपने आपको जानने की कोशिश करे ? क्या कोई ऐसा करेगा ? कोई भी नहीं । क्योंकि यह बहुत ही सुरक्षित और आसान है कि हम प्रभुत्व स्वीकार लें । तब कोई भी अपने आपको सुरक्षित संरक्षित महसूस करता है । लेकिन यदि कोई पूर्णतः अन्य लोगों । किसी के भी प्रभुत्व प्रभाव को त्याग दे । तो कोई कैसे अपनी ही गतिविधियों का अवलोकन कर सकता है ? क्योंकि स्वत्व कोई स्थायी चीज तो है नहीं । यह निरंतर गतिशील है । जिन्दा है । कार्य कर रहा है । कोई उस चीज के बारे में कैसे देखे जाने । अवलोकन करे । जो निरंतर आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत गतिशील है । पूरे आग्रह के साथ । आकांक्षाओं । लोभ । रोमांस के साथ ? जिसका तात्पर्य है । क्या कोई अपनी ही गतिविधियों का अवलोकन कर सकता है । अपनी सभी इच्छाओं और भयों सहित । बिना अन्य लोगों से ज्ञान लिये । या बिना उस ज्ञान के । जो उसने अपने आपको जानने के लिए स्वयं ही इकट्ठा कर रखा है ।
स्‍वाधीनता दी नहीं जा सकती । स्‍वाधीनता कुछ ऐसा है । जो तब आती है । जब आप उसे नहीं खोजते । यह तब अपने आप आती है । जब आप जान जाते हैं कि - आप कैदी हैं । जब आप अपने ही बारे में जानते हैं कि आप यंत्र बद्ध से हैं । जब आप जानते हैं कि आप समाज । संस्कृति । परंपराओं । और वो सब । जो आप कहते हैं । उनके द्वारा चलाये जा रहे हैं । स्‍वाधीनता एक सामान्यपन है । यह असामान्य चीज नहीं है । और यह प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्णत । बाहरी और आंतरिक रूप से होनी ही चाहिये । बिना स्‍वाधीनता के आपकी दृष्टि में स्पष्टता नहीं होती ।

बिना स्‍वाधीनता के आप प्रेम नहीं कर सकते । बिना स्‍वाधीनता के आप सत्य की खोज नहीं कर सकते । बिना स्‍वाधीनता के आप मन की सीमाओं से पार नहीं पा सकते । आपको अपने पूरे अस्तित्व से इसकी अभीप्सा जगानी होगी । जब आप अपने से ही इसकी अत्यंतिक मांग उठायेंगे । तब आप अपने में ही इसे पा सकेंगे । और यह जान सकेंगे कि - स्‍वाधीनता । सामान्य पन सहज पन क्या है ? और नियत चिह्नों पर चलने । लकीरें पीटने से स्‍वाधीनता नहीं मिलती । ना ही यह आदतों का प्रतिफल होती है ।
जीवन में प्रति पल हो रहे परिवर्तनों के । निरन्तर स्पर्श में रहने को देखना । ध्यान है । एक व्यक्ति जो एक पापी से संत होने की विकास यात्रा में है । वह एक संभृम से अन्य भृम में यात्रा कर रहा है । यह सारी गति भृम में ही है ।  जब मन यह भृम ही देख लेता है । तब वह पुनः भृम नहीं पैदा करता । ना ही किसी तरह की नाप जोख या मापने को जारी रखता है । अंततः इसलिए बेहतर होते होते । विचार का अंत आ जाता है । इन सबके साथ ही मुक्ति की अवस्था उदित होती है । और यही पवित्र पावन है । केवल यहीं वह उपलब्ध होता है । जो निरंतर है ।
सब तरह से मुक्त होना है । ज्ञात से मुक्ति । मन की वह अवस्था । जो कहती है - मैं नहीं जानता ? और जो उत्तर की राह भी नहीं तकती । ऐसा मन जो पूर्णतः किसी तलाश में नहीं होता । ना ही ऐसी आशा करता है । ऐसे मन की 


अवस्था में आप कह सकते हैं कि - मैं समझा । केवल यही वह अवस्था होती है । जब मन मुक्त होता है । इस अवस्था से आप उन चीजों को भी एक अलग ही तरह से देख सकते । जिन्हें आप जानते हैं । ज्ञात से आप अज्ञात को नहीं देख सकते । लेकिन जब कभी एक बार आप मन की उस अवस्था को समझ जाते हैं । जो मुक्त है । जो मन कहता है कि - मैं नहीं जानता । और अजाना ही रहता है । इसलिए वह अबोध है । उस अवस्था से एक नागरिक । एक विवाहित । या आप जो भी हों वास्तविक कर्म करना शुरू करते हैं । तब आप जो भी करते हैं । उसमें एक सुसंगतता होती है । जीवन में महत्व होता है ।
लेकिन हम ज्ञात की सीमा में ही रहते हैं । उसकी सभी विषमताओं के साथ । जी तोड़ प्रयासों । विवादों और पीड़ाओं के साथ और वहां से हम तलाश करते हैं । उसकी । जो अज्ञात है । इसलिए वास्तव में हम मुक्ति नहीं चाह रहे हैं । हम जो चाहते हैं । वह है । जो है । उसमें ही निरंतरता । वही पुरानी चीजों को और खींचना या लम्बाना । जो ज्ञात ही हैं ।
श्रीमन ! प्रतिभा और गूढ़ता हमेशा ही आवरण में सहेजने चाहिये । क्योंकि इनको ज्यादा उघाड़ना केवल अन्धेपन का कारण ही बनता है । इसलिए मेरा यह मन्तव्य कभी भी नहीं रहता कि - मैं लोगों को अन्धा करूं । या अपनी प्रवीणता का प्रदर्शन करूँ । यह निहायत ही मूर्खता पूर्ण है । लेकिन जब कोई चीजों को बहुत ही साफ साफ देखता है । तो वह उन्हें अपने से परे रखने में सहायता नहीं पाता । इन्हें ही आप प्रतिभा और गूढ़ता के रूप में सोचते हैं ।  मेरे लिये । मैं जो भी कह रह हूँ । वह प्रतिभा पूर्ण नहीं है । ऐसा सहज निश्चित है । यह एक तथ्य है । एक और बात । आप चाहते हैं कि - मैं एक आश्रम या समुदाय की स्थापित करूँ । अब बतायें । क्यों ? आप मुझसे ये क्यों चाहते हैं कि - एक समुदाय की स्थापना करूं ? आप कह रहे हैं कि वह एक सन्दर्भ या पहचान के रूप में कार्य करेगा । या वो कुछ एक सफल प्रयोग के रूप में रखा । या दिखाया जा सकेगा ।  यही तो है । सन्दर्भ या पहचान का तात्पर्य । क्या ऐसा ही नहीं है ? एक समुदाय । जहाँ इसी तरह की सारी चीजें चलायी जायेंगी । यही है । जो आप चाहते हैं । मैं नहीं चाहता कि किसी आश्रम या समुदाय की स्थापना हो । आप चाहते हैं । अब आप क्यों इस तरह के समुदाय की मांग कर रहे हैं ? मैं आपको बताता हूँ कि - क्यों ? यह बहुत ही रूचि कर है । नहीं ? आप ऐसा इसलिए चाहते हैं कि आप अन्य लोगों के साथ 


उससे जुड़ना चाहते हैं । और एक समुदाय गढ़ना चाहते हैं । लेकिन आप अपने ही साथ एक समुदाय आरंभ करना नहीं चाहते । आप चाहते हैं कि कोई अन्य ऐसा करे । और जब कोई समुदाय की स्थापना कर दे । तब आप उसे ज्वाइन कर लें । दूसरे शब्दों में श्रीमन आप अपना ही समुदाय आरंभ करने से घबराते हैं । इसलिए एक सन्दर्भ रूप में । कोई आश्रम या समुदाय चाहते हैं । यही है । आप चाहते हैं कि कोई आपको किसी तरह की जिम्मेदारी या दायित्व दे । संस्थापित करे । और आप उसे प्रभुता पूर्वक सहेजे । सम्हालें । चलायें । अन्य शब्दों में आप अपने आप में आत्म विश्वस्त नहीं हैं । इसलिए आप चाहते हैं कि किसी समुदाय की स्थापना हो । और आप उसे ज्वाइन कर लें ।
श्रीमन ! आप जहाँ भी हैं । आप वहीं एक समुदाय पा सकते हैं । लेकिन वह समुदाय आप तभी पा सकते हैं । जब आपमें आत्म विश्वास हो । समस्या यह है कि - आपमें आत्म विश्वास ही नहीं है । आपमें आत्म विश्वास क्यों नहीं है ? मेरा आत्म विश्वास का अभिप्राय क्या है ? एक व्यक्ति । जो कोई परिणाम को उपलब्ध करना चाहता है । वह वो सब प्राप्त करता है । जो वह पाना चाहता है । एक व्यापारी । एक वकील । एक पुलिसिया । जनरल । ये लोग । आत्म विश्वास से भरे हैं । आत्म विश्वास से पूर्ण होते हैं । लेकिन यहीं आप में आत्म विश्वास नहीं है । क्यों ? एक साधारण सा कारण है कि - आपने प्रयोग नहीं किया है । आपने जो भी समझा है । उसे व्यवहार में नहीं लायें हैं । जब आप इसे प्रयोग में लायेंगे । तब आपके पास आत्म विश्वास होगा । दुनिया में कोई भी व्यक्ति आपको आत्म विश्वास नहीं दे सकता ? न कोई किताब । ना कोई शिक्षक । आपको आत्म विश्वास से नहीं भर सकते । प्रोत्साहन आत्म विश्वास नहीं होता । प्रोत्साहन अत्यंत सतही । बचकाना । अपरिपक्व चीज है । आत्म विश्वास आता है । जब आप प्रयोग में उतरते हैं । जब आप राष्ट्रीयता से प्रयोग में उतरते हैं । तो देखिये । बुद्धि तो बहुत ही छोटी सी चीज है । तो जब भी आप प्रयोग में हो । व्यावहारिक हों । आपमें आत्म विश्वास होता है । क्योंकि आपका मन तेज द्रुतगामी और लचीला होता है । तब आप जहाँ भी होंगे । वहीं आश्रम होगा । आप अपने आप ही एक समुदाय की स्थापना कर सकेंगे । यह स्पष्ट है । क्या नहीं ?
आप किसी भी समुदाय से अधिक महत्वपूर्ण हैं । यदि आप किसी समुदाय की सदस्यता ग्रहण करें । तो आप वही रहेंगे । जो कि आप हैं । कोई आपका वरिष्ठ होगा । आपके लिए नियम कायदे कानून होंगे । अनुशासन होंगे । आप उस बेकार के समुदाय में वही कोई श्री राम या श्री राव होंगे । आप किसी समुदाय की आकांक्षा तभी करते हैं । जब आप चाहते हैं कि - आपको कोई निर्देशित करे । आपको बताये कि आपको क्या करना है । एक आदमी जो अपने आपको निर्देशित हुए देखना चाहता है । वह अपनी आत्म विश्वास हीनता को जानता है । आप आत्म विश्वास पा सकते हैं । पर आत्म विश्वास संबंधी बातें करके ही नहीं । अपितु जब आप प्रयोग में उतरेंगे । तब आप कब कोशिश करेंगे । श्रीमन । केवल आप ही हैं । जो सन्दर्भ हो सकते हैं । ना कि कोई समुदाय । या आश्रम । और जब कोई समुदाय या आश्रम आपकी पहचान बने । आप अपने आप को खो देते हैं । मुझे आशा करता हूँ कि - बहुत से लोग आपस में जुड़े । और प्रयोग करें । आत्म विश्वास से भरें । इसलिए इस कार्य में इकट्ठा आयें । लेकिन वे लोग जो बाहर ही रहना चाहते हैं । और कहते हैं - मैं सदस्यता ग्रहण करना चाहता हूँ । इसलिए आप कोई समुदाय क्यों नहीं स्थापित करते । यह निहायत ही मूर्खता पूर्ण प्रश्न करने वाले हैं । जे. कृष्णमूर्ति

सोमवार, नवंबर 21, 2011

इसलिए भी यह महावाक्य बहुत अदभुत है

प्यारे ओशो ! जब तन्का द्वारा बुद्ध की काष्ठ मूर्ति को जलाए जाने की घटना के बारे में तेन्जिक से पूछा गया । तो उसने उत्तर दिया - जब शीत अधिक होती है । तो हम चूल्हे की आग के चारों ओर इकट्ठे हो जाते हैं । क्या वह गलत था । अथवा नहीं ?  भिक्षु ने जोर देकर पूछा ।
तेन्जीकू ने कहा - जब गर्मी लगती है । तो हम घाटी के बांसवन में जाकर बैठ जाते हैं । मूर्ति के जला देने के दूसरे दिन । तन्का तेनिन । झेन सदगुरु नान यो से भेंट करने गया । जो कभी झेन सदगुरुओं के सम्राट ईनो का शिष्य रहा था । जब तन्का । झाझेन ध्यान में बैठने के लिए । अपने कंबल की तह खोलने लगा । तो नान-यो ने कहा - उसके खोलने की कोई आवश्यकता नहीं है । तन्का कुछ कदम पीछे हटा ।
नान-यो ने कहा - यह बिलकुल ठीक है । इस पर तन्का कुछ कदम आगे बढ़ा । नान-यो ने कहा - यह ठीक नहीं है । तन्का ने नान-यो के चारों ओर घूम कर एक परिक्रमा की । और वहां से चला गया । नान-यो ने टिप्पणी करते हुए कहा - पुराने सुनहरे दिन अब विदा हो गए हैं । और अब लोग कितने अधिक आलसी हो गए हैं । आज से 30 वर्ष बाद । इस व्यक्ति को रोक पाना बहुत कठिन होगा ।  मित्रो ! झेन मैनिफेस्टो अर्थात झेन के उदघोष के लिए । आज का समय बिलकुल परिपक्व है । पश्चिम के बुद्धिजीवी अब झेन से भलीभांति परिचित हो चुके हैं । वे लोग झेन से प्रेम करने लगे हैं । लेकिन वे अभी भी झेन तक पहुंचने का प्रयास बुद्धि से कर रहे हैं । वे अभी तक यह नहीं समझ सके हैं कि झेन का बुद्धि के साथ कुछ भी लेना देना नहीं है । उसका एक बहुत बड़ा कार्य है । तुम्हें बुद्धि के कारागृह से मुक्त करना । यह कोई बुद्धिगत दर्शन शास्त्र नहीं है । यह दर्शन शास्त्र है ही नहीं । और न यह कोई धर्म ही है । क्योंकि इसके पास न तो काल्पनिक कथाएं हैं । न झूठे व्याख्यान हैं । और न उसके पास देने के लिए कोई झूठे आश्वासन हैं । यह तो एक सिंह गर्जना है । और सबसे बड़ी बात तो यह है कि झेन इस संसार में स्वयं से ही मुक्त होने का उदघोष लेकर आया है ।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते । ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।
ॐ वह पूर्ण है । और यह भी पूर्ण है । क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है । तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है । ॐ शांति, शांति, शांति ।
यह महा वाक्य कई अर्थों में अनूठा है । एक तो इस अर्थ में कि ईशावास्य उपनिषद इस महावाक्य पर शुरू भी होता है । और पूरा भी । जो भी कहा जाने वाला है । जो भी कहा जा सकता है । वह इस सूत्र में पूरा आ गया है । जो समझ सकते हैं । उनके लिए ईशावास्य आगे पढ़ने की कोई भी जरूरत नहीं है । जो नहीं समझ सकते हैं । शेष पुस्तक उनके लिए ही कही गई है ।
इसीलिए साधारणतः ॐ शांतिः शांतिः शांतिः का पाठ । जो कि पुस्तक के अंत में होता है । इस पहले वचन के ही अंत में है । जो जानते हैं । उनके हिसाब से बात पूरी हो गई है । जो नहीं जानते हैं । उनके लिए सिर्फ शुरू होती है ।
इसलिए भी यह महावाक्य बहुत अदभुत है कि पूरब और पश्चिम के सोचने के ढंग का भेद इस महा वाक्य से स्पष्ट होता है । दो तरह के तर्क । दो तरह की लाजिक सिस्टम्स विकसित हुई हैं दुनिया में । एक यूनान में । एक भारत में ।
यूनान में जो तर्क की पद्धति विकसित हुई । उससे पश्चिम के सारे विज्ञान का जन्म हुआ । और भारत में जो विचार की पद्धति विकसित हुई । उससे धर्म का जन्म हुआ । दोनों में कुछ बुनियादी भेद हैं । और सबसे पहला भेद यह है कि पश्चिम में । यूनान ने जो तर्क की पद्धति विकसित की । उसकी समझ है कि निष्कर्ष, कनक्लूजन हमेशा अंत में मिलता है । साधारणतः ठीक मालूम होगी बात । हम खोजेंगे सत्य को । खोज पहले होगी । विधि पहले होगी । प्रक्रिया पहले होगी । निष्कर्ष तो अंत में हाथ आएगा । इसलिए यूनानी चिंतन पहले सोचेगा । खोजेगा । अंत में निष्कर्ष देगा ।
भारत ठीक उलटा सोचता है । भारत कहता है । जिसे हम खोजने जा रहे हैं । वह सदा से मौजूद है । वह हमारी खोज के बाद में प्रगट नहीं होता । हमारे खोज के पहले भी मौजूद है । जिस सत्य का उदघाटन होगा । वह सत्य । हम नहीं थे । तब भी था । हमने जब नहीं खोजा था । तब भी था । हम जब नहीं जानते थे । तब भी उतना ही था । जितना जब हम जान लेंगे । तब होगा । खोज से सत्य सिर्फ हमारे अनुभव में प्रगट होता है । सत्य निर्मित नहीं होता । सत्य हमसे पहले मौजूद है । इसलिए भारतीय तर्कणा पहले निष्कर्ष को बोल देती है । फिर प्रक्रिया की बात करती है । दि कनक्लूजन फर्स्ट । देन दि मैथडलाजी एंड दि प्रोसेस । पहले निष्कर्ष । फिर प्रक्रिया । यूनान में पहले प्रक्रिया । फिर खोज । फिर निष्कर्ष । 

india के लोचपोच आदमियों में यह भी एक कारण है

सब तीर्थ बहुत ख्‍याल से बनाये गए है । अब जैसे कि मिश्र में पिरामिड है । वे मिश्र में पुरानी खो गई सभ्‍यता के तीर्थ है । और 1 बड़ी मजे की बात है कि इन पिरामिड के अंदर । क्‍योंकि पिरामिड जब बने तब । वैज्ञानिको का खयाल है । उस काल में इलेक्ट्रिसिटी हो नहीं सकती ।
आदमी के पास बिजली नहीं हो सकती । बिजली का आविष्‍कार उस वक्‍त कहां । कोई 10 हजार वर्ष पुराना पिरामिड है । कई 20 हजार वर्ष पुराना पिरामिड है । तब बिजली का तो कोई उपाय नहीं था । और इनके अंदर इतना अँधेरा कि उस अंधेरे में जाने का कोई उपाय नहीं है । अनुमान यह लगाया जा सकता है कि लोग मशाल ले जाते हों । या दीये ले जाते हो । लेकिन धुएँ का 1 भी निशान नहीं है । इतने पिरामिड में कहीं । इसलिए बड़ी मुश्‍किल है । 1 छोटा सा दीया घर में जलाएगें । तो पता चल जाता है । अगर लोग मशालें भीतर ले गए हों । तो इन पत्‍थरों पर कहीं न कहीं न कहीं धुएँ के निशान तो होने चाहिए ।
रास्‍ते इतने लंबे । इतने मोड़ वाले है । और गहन अंधकार है । तो 2 ही उपाय हैं । या तो हम मानें कि बिजली रही होगी । लेकिन बिजली की किसी तरह की फ़िटिंग का कहीं कोई निशान नहीं है । बिजली पहुंचाने का कुछ तो इंतजाम होना चाहिए । दूसरा आदमी सोच सकता है । तेल । घी के दीयों या मशालों का । पर उन सबसे किसी न किसी तरह के निशान पड़ते है । जो कहीं भी नहीं है । फिर उनके भीतर आदमी कैसे जाता रहा है । कोई कहेगा । नहीं जाता होगा । तो इतने रास्‍ते बनाने की कोई जरूरत नहीं है । पर सीढ़ियाँ है । रास्‍ते है । द्वार है । दरवाजे है । अंदर चलने फिरने का बड़ा इंतजाम है । 1-1 पिरामिड में बहुत से लोग प्रवेश कर सकते है । बैठने के स्‍थान है अंदर । वह सब किस लिये होंगे । यह पहेली बनी रह गई है । और साफ नहीं हो पाएगी कभी भी । क्‍योंकि पिरामिड की समझ नहीं है साफ । कि ये किस लिये बनाए गए है ? लोग समझते है । किसी सम्राट का फितूर होगा । कुछ और होगा ।
लेकिन ये तीर्थ है । और इन पिरामिड में प्रवेश का सूत्र ही यही है कि जब कोई अंतर अग्‍नि पर ठीक से प्रयोग करता है । तो उसका शरीर आभा फेंकने लगता है । और तब वह अंधेरे में प्रवेश कर सकता है । तो न तो यहां बिजली उपयोग की गई है ।  न यहां कभी दीया उपयोग किया गया है । न मशाल का उपयोग किया गया है । सिर्फ शरीर की दीप्‍ति उपयोग कि गई थी । लेकिन वह शरीर की दीप्ति अग्‍नि के विशेष प्रयोग से ही होती है । इनमें प्रवेश ही वही करेगा । जो इस अंधकार में मजे से चल सके । वह उसकी कसौटी भी है । परीक्षा भी है । और उसको प्रवेश का हक भी है । वह हकदार भी है ।
जब पहली बार 1905 या 10 में 1-1 पिरामिड खोजा जो रहा था । तो जो वैज्ञानिक उस पर काम कर रहा था । उसका सहयोगी अचानक खो गया । बहुत तलाश की गई । कुछ पता न चला । यहीं डर हुआ कि वह किसी गलियारे में अंदर है । बहुत प्रकाश और सर्च लाईट ले जाकर खोजा । वह कोई 24 घंटे खोया रहा  । 24 घंटे बाद । कोई रात 2 बजे वह भागा हुआ आया । करीब पागल हालत में । उसने कहा । मैं टटोलकर अंदर जा रहा था कि कहीं मुझे दरवाजा मालूम पड़ा । मैं अंदर गया । और फिर ऐसा लगा कि पीछे कोई चीज बंद हो गई । मैंने लौटकर देखा । तो दरवाजा तो बंद हो चुका था । जब मैं आया । तब खुला था । पर दरवाजा भी नहीं था कोई । सिर्फ खुला था । फिर इसके सिवाय कोई उपाय नहीं था कि मैं आगे चला जाऊँ । और मैं ऐसी अदभुत चीजें देखकर लौटा हूं । जिसका कोई हिसाब लगाना मुश्‍किल है ।
वह इतनी देर गुम रहा । वह पक्‍का है । वह इतना परेशान लौटा है । पक्‍का है । लेकिन जो बातें वह कह रहा है । वह भरोसे की नहीं है कि ऐसी चीजें होंगी । बहुत खोजबीन की गई । उस दरवाजे की । लेकिन दरवाजा दुबारा नहीं मिल सका । न तो वह यह बता पाया कि कहां से प्रवेश किया । न यह बता पाया कि वह कहां से निकला । तो समझा गया कि या तो वह बेहोश हो गया । या उसने कहीं सपना देखा । या वह कहीं सो गया । और कुछ समझने का चारा नहीं था ।
लेकिन जो चीजें उसने कही थी । वह सब नोट कर ली गयीं । उस साइकिक अवस्‍था में । स्वपनवत अवस्‍था में । जो जो उसने वहां देखीं । फिर खुदाई में कुछ पुस्‍तकें मिलीं । जिनमें उन चीजों का वर्णन भी मिला । तब बहुत मुसीबत हो गई । उस वर्णन से लगा कि वह चीजें किसी कमरे में वहां बंद है । लेकिन उस कमरे का द्वार किसी विशेष मनोदशा में खुलता है । अब इस बात की संभावना है कि वह एक सांयोगिक घटना थी कि इसकी मनोदशा वैसी रही हो । क्‍योंकि इसे तो कुछ पता नहीं था । लेकिन द्वार खुला अवश्‍य । तो जिन गुप्‍त तीर्थों की मैं बात कर रहा हूं । उनके द्वार है । उन तक पहुंचने की व्‍यवस्‍थाएं है । लेकिन उस सबके आंतरिक सूत्र है । इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके । जैसे कि पिरामिड के सारे कमरे । उनका आयतन 1 हिसाब में है । कभी आपने ख्‍याल किया । कहीं छप्‍पर बहुत नीचा हो । लेकिन आपके सिर को नहीं छू रहा हो । और यही छप्‍पर थोड़ा सरक कर नीचे आने लगे । हमको दबाएगा नहीं । हम से अभी 2 फिट ऊँचा है । लेकिन हमें आभास होगा कि हमारे भीतर कोई चीज दबने लगी ।
जब नीचे छप्‍पर में आप प्रवेश करते है । तो आपके भीतर कोई चीज सिकुड़ती है । और आप जब बड़े छप्‍पर के नीचे प्रवेश करते है । तो आपके भीतर कोई चीज फैलती है । कमरे का आयतन इस ढंग से निर्मित किया जा सकता है । ठीक उतना किया जा सकता है । जितने में आपको ध्यान आसान हो जाए । सरलतम हो जाए । ध्‍यान आपको । उतना आयतन निर्मित किया जा सकता है । उतना आयतन खोज लिया गया था । उस आयतन का उपयोग किया जा सकता है । आपके भी सिकुडने ओर फैलने के लिए । उस कमरे के भीतर रंग । उस कमरे के भीतर गंध । उस कमरे के भीतर ध्‍वनि । इस सबका इंतजाम किया जा सकता है । जो आपके ध्‍यान के लिए सहयोगी हो जाए ।
सब तीर्थों का अपना संगीत था । सच तो यह है कि सब संगीत । तीर्थों में पैदा हुए । और सब संगीत साधकों ने पैदा किए । सब संगीत । किसी दिन मंदिर में पैदा हुए । सब नृत्‍य । किसी दिन मंदिर में पैदा हुए । सब सुगंध । पहली दफा मंदिर में उपयोग की गई । 1 दफा जब यह बात पता चल गई कि संगीत के माध्‍यम से कोई व्‍यक्‍ति परमात्‍मा की तरफ जा सकता है । तो संगीत के माध्यम से परमात्‍मा के विपरीत भी जा सकता है । यह भी ख्‍याल में आ गया । और तब बाद में दूसरे संगीत खोजें गए । किसी गंध से । जबकि परमात्‍मा की तरफ जाया जा सकता है । तो विपरीत किसी गंध से । कामुकता की तरफ जाया जा सकता है । गंधें भी खोज ली गई । किसी विशेष आयतन में ध्‍यानस्‍थ हो सकता है । तो किसी विशेष आयतन में ध्‍यान से रोका जा सकता है । वह भी खोज लिया गया ।
जैसे अभी चीन में ब्रेन वाश के लिए जहां कैदियों को खड़ा करते है । उस कोठरी का एक विशेष आयतन है । उस विशेष आयतन में ही खड़ा करते है । और उन्‍होंने अनुभव किया कि उस आयतन में कभी बेशी करने से ब्रेन वाश करने में मुसीबत पड़ती है । 1 निश्चित आयतन । हजारों प्रयोग करके तय हो गया कि इतनी ऊंची । इतनी चौड़ी । इतनी आयतन की कोठरी में कैदियों को खड़ा कर दो । तो कितनी देर में डिटीरीओरेशन हो जाएगा । कितनी देर में खो देगा । वह अपने दिमाग को । फिर उसमें 1 विशेष ध्‍वनि भी पैदा करो । तो और जल्‍दी खो देगा । खास जगह उसके मस्‍तिष्‍क पर हेमरिंग करो । तो और जल्दी खो देगा ।
वे कुछ नहीं करते । 1 मटका ऊपर रख देते है । और 1-1 बूंद पानी उसकी खोपड़ी पर टपकता रहता है । उसकी अपनी लय है । रिदिम है । बस । टप टप वह पानी सर पर टपकता रहता है । 24 घंटे वह आदमी खड़ा है । बैठ भी नहीं सकता । हिल भी नहीं सकता । आयतन इतना है । कोठरी का लेट भी नहीं सकता । वह खड़ा है । मस्‍तिष्‍क में पानी टप टप गिरता जा रहा है । आधा घंटा पूरे होते होते 30 मिनट पूरे होते होते सिवाय टप टप की आवाज के कुछ नहीं बचता । आवाज इतनी जोर से मालूम होने लगेगी । जैसे पहाड़ गिर रहा है । अकेली आवाज रह जाएगी । उस आयतन में । और 24 घंटे में वह आपके दिमाग को अस्‍त व्‍यस्‍त कर देगी । 24 घंटे के बाद जब आपको बाहर निकालेंगे । तो आप वहीं आदमी नहीं होगें । उन्‍होंने आपको सब तरह से तोड़ दिया है ।
ये सारे के सारे प्रयोग । पहली दफा तीर्थों में खोजें गए । मंदिरों में खोजें गए । जहां से आदमी को सहायता पहुँचाई जा सके । मंदिर के घंटे है । मंदिर की ध्वनियाँ है । धूप है । गंध है । फूल है । सब नियोजित था । और 1 सातत्य रखने की कोशिश की गई । उसकी कंटीन्युटी न टूटे । बीच में कहीं कोई व्‍यवधान न पड़े । अहर्निश धारा । उसकी जारी रखी जाती रही । जैसे सुबह इतने वक्‍त आरती होगी । इतनी देर चलेगी । इस मंत्र के साथ होगी । दोपहर आरती होगी । इतनी देर चलेगी । इस मंत्र के साथ होगी । सांझ आरती होगी । इतनी देर चलेगी । यह क्रम ध्‍वनियों का उस कोठरी में गूंजता रहेगा । पहला क्रम टूटे । उसके पहले दूसरा रीप्लेस हो जाए  । यह हजारों साल तक चलेगा ।
जैसा मैंने कहा । पानी को अगर लाख दफा पानी बनाया जाए । भाप बनाकर । तो जैसे उसकी क्‍वालिटी बदलती है । अल्‍केमी के हिसाब से उसी प्रकार 1 ध्‍वनि को लाखों दफा पैदा किया जाए । एक कमरे में तो उस कमरे की पूरी तरंग । पूरी गुणवत्‍ता बदल जाती है । उसकी पूरी क्वालिटी बदल जाती है । उसके बीच व्‍यक्‍ति को खड़ा कर देना । उसके पास खड़ा कर देना । उसके रूपांतरित होने के लिए । आसानी जुटा देगा । और चूंकि हमारा सारा का सारा व्‍यक्‍तित्व को बदलने लगता है । और आदमी इतना बाहर है कि पहले बाहर से ही फर्क उसको आसान पड़ते है । भीतर के फर्क तो पहले बहुत कठिन पड़ते है । दूसरा उपाय था । पदार्थ के द्वारा सारी ऐसी व्‍यवस्‍था दे देना कि आपके शरीर को जो जो सहयोगी हो । वह हो जाए ।
जितने दूर का नाता होगा । उतना ही बच्‍चा सुंदर होगा । स्‍वस्‍थ होगा । बलशाली होगा । मेधावी होगा । इसलिए फिक्र की जाती रही कि भाई बहन का विवाह न हो । दूर संबंध खोजें जाते है । जिलों गोत्र का भी नाता न हो । 3-4-5 पीढ़ियों का भी नाता न हो । क्‍योंकि जितने दूर का नाता हो । उतना ही बच्‍चे के भीतर मां और पिता के जो वीर्याणु और अंडे का मिलन होगा । उसमें दूरी होगी । तो उस दूरी के कारण ही व्‍यक्‍तित्‍व में गरिमा होती है ।
इसलिए मैं इस पक्ष में हूं कि भारतीय को भारतीय से विवाह नहीं करना चाहिए । जापानी से करे । चीनी से करे । तिब्‍बती से करे । इरानी से करे । जर्मन से करे । भारतीय से न करे । क्‍योंकि जब दूर ही करनी है । जितनी दूर हो । उतना अच्‍छा ।
और अब तो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है बात । पशु पक्षियों के लिए हम प्रयोग भी कर रहे है । लेकिन आदमी हमेशा पिछड़ा हुआ होता है । क्‍योंकि उसकी जकड़ रूढ़िगत होती है । अगर हमको अच्‍छी गाय की नस्‍ल पैदा करनी है । तो हम बाहर से वीर्य अणु बुलाते है । अंग्रेज सांड का वीर्य अणु बुलाते है । भारतीय गाय के लिए । और कभी नहीं सोचते कि गऊ माता के साथ क्‍या कर रहे हो तुम यह । गऊ माता और अंग्रेज पिता । शर्म नहीं आती । लाज संकोच नहीं । मगर उतने ही स्‍वस्‍थ बच्‍चे पैदा होंगे । उतनी ही अच्‍छी नस्‍ल होगी ।
इसलिए पशुओं की नसलें सुधरती जा रही है । खासकर पश्‍चिम में तो पशुओं की नसलें बहुत सधुर गई है । कल्‍पनातीत । 60-60 लीटर दूध देने वाली गायें । कभी दूनिया में नहीं थी । और उसका कुल कारण यह है कि दूर दूर के वीर्याणु को मिलाते जाते है । हर बार । आने वाले बच्‍चे और ज्‍यादा स्‍वास्‍थ और भी स्वारथ होते जाते है । कृतों की नसलों में इतनी क्रांति हो गई है कि जैसे कुत्ते कभी नहीं थे । दुनियां में । रूस में फलों में क्रांति हो गई हे । कयोंकि फलों के साथ भी यही प्रयोग कर रहे है । आज रूस के पास जैसे फल है । दुनिया में किसी के पास नहीं है । उनके फल बड़े है । ज्‍यादा रस भरे है । ज्‍यादा पौष्‍टिक है । और सारी तरकीब 1 है । जितनी ज्‍यादा दूरी हो ।
भारत की दीन हीनता में यह भी एक कारण है । india के लोचपोच आदमियों में यह भी एक कारण है । क्‍योंकि जैन सिर्फ जैनों के साथ ही विवाह करेंगे । अब जैनों की कुल संख्‍या 30 लाख है । महावीर को मरे 2500 साल हो गए । अगर महावीर ने 30 जोड़ों को संन्‍यास दिया होता । तो 30 लाख की संख्‍या हो जाती । 30 जोड़े काफ़ी थे । तो अब जैनों का सारा संबंध जैनों से ही होगा । और जैनों में भी । श्‍वेतांबर का श्‍वेतांबर से । और दिगंबर का दिगंबर से । और सब श्‍वेतांबर से नहीं । तेरा पंथी का तेरा पंथी से । और स्‍थानक वासी का स्‍थानक वासी से । और छोटे छोटे टुकड़े है । संख्‍या हजारों में रह जाती है । और उन्हीं के भीतर गोलगोल घूमते रहते है लोग । छोटे छोटे तालाब है । और उन्‍हीं के भीतर लोग बच्‍चे पैदा करते रहते है । इससे कचरा पैदा होता है । सारी दुनिया में सबसे ज्‍यादा कचरा इस भारत में है । फिर तुम रोते हो कि यह अब कचरे का क्‍यों पैदा हो रहा है । तुम खुद इसके जिम्‍मेदार हो ।
ब्राह्मण सिर्फ ब्राह्मणों से शादी करेंगे । और वह भी सभी ब्राह्मणों से नहीं । कान्‍यकुब्‍ज ब्राह्मण कान्‍यकुब्‍ज से करेंगे । और देशस्‍थ देशस्‍थ से । और कोंकणस्‍थ कोंकणस्‍थ से । और स्‍वस्‍थ ब्राह्मण तो मिलते ही कहां हैं । मुझे तो अभी तक नहीं मिला । कोई भी । और असल में । स्‍वस्‍थ हो । उसी को ब्राह्मण कहना चाहिए । स्‍वयं में स्‍थित हो । वही ब्राह्मण है ।
और यह जो भारत की दुर्गति है । उसमें एक बुनियादी कारण यह भी है कि यहां सब जातियां अपने अपने घेरे में जी रही हैं । यहीं बच्‍चे पैदा करना । कचड़  बचड़ । वही होती रहेगी । थोड़ा बहुत बचाव करेंगे । मगर कितना बचाव करोगे । जिससे भी शादी करोगे । 2-4-5 पीढ़ी पहले उससे तुम्‍हारे भाई बहन का संबंध रहा होगा । 2-4-5 पीढ़ी ज्‍यादा से ज्‍यादा कर सकते हो । इससे ज्‍यादा नहीं बचा सकते । जितना छोटा समाज होगा । उतना बचाव करना । कठिन हो जायेगा । जितना छोटा समाज होगा,। उतनी संतति में पतन होगा । थोड़ा मुक्‍त होओ । ब्राह्मण को विवाह करने दो जैन से । जैन को विवाह करने दो हरिजन से । हरिजन को विवाह करने दो मुसलमान से । मुसलमान को विवाह करने दो ईसाई से । तोड़ो ये सारी सीमाएं । निकलो एक बार इस कूप से । देखो फिर उँची संतति को ।

खाओ पीओ और मौज करो बस यही 1 मात्र धर्म है

मनुष्य का इतिहास 1 अत्यंत दुखद घटना रहा है । और इसके दुखद होने का कारण समझना । बहुत कठिन नहीं है । उसे खोजने के लिए तुम्हें । ज्यादा दूर जाना न पड़ेगा । वह प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है ।
मनुष्य के पूरे अतीत ने । मनुष्य में 1 विभाजन पैदा कर दिया है । हर आदमी के भीतर निरंतर 1 शीत युद्ध चल रहा है । यदि तुम्हें बेचैनी का अनुभव होता है । तो उसका कारण व्यक्तिगत नहीं है । तुम्हारी बीमारी सामाजिक है । और जिस चालाकी से भरी तरकीब का उपयोग किया गया है । वह है । तुम्हें दुश्मनों के 2 खेमों में बांटना । 1 भौतिकवादी 2 अध्यात्मवादी । 1 जोरबा  2 बुद्ध ।
वस्तुतः तुम बंटे हुए नहीं हो । वास्तविकता यह है कि तुम अखंड हो । 1 स्वर में । 1 लय में आबद्ध । लेकिन तुम्हारे मन में यह संस्कार गहरा बैठा है कि तुम 1 नहीं हो । अखंड नहीं हो । पूर्ण नहीं हो । तुम्हें अपने शरीर के खिलाफ लड़ना होगा । यदि आध्यात्मिक होना चाहते हो । तो तुम्हें अपने body को हर संभव तरीके से जीतना पड़ेगा । उसे हराना पड़ेगा । उसे सताना और नष्ट करना पड़ेगा ।
पूरी दुनिया में यह धारणा स्वीकृत रही है । विभिन्न धर्मों में । विभिन्न संस्कृतियों में । उसके रंग रूप । भिन्न भिन्न हो सकते हैं । किंतु आधारभूत सिद्धांत वही है । मनुष्य को विभाजित करो । उसमें संघर्ष पैदा करो । जिससे 1 हिस्सा श्रेष्ठ अनुभव करने लगे । पवित्र बन जाए । पुण्यात्मा बन जाये । और दूसरे हिस्से की पापी की तरह निंदा करना शुरू कर दे ।
मगर कठिनाई यह है कि तुम 1 हो । तुम्हें खंडित करने का कोई उपाय नहीं है । हर विभाजन तुम में दुख पैदा करने वाला है । विभाजन का अर्थ होगा कि तुम्हारी आत्मा का आधा भाग । दूसरे आधे भाग से लड़ रहा है । और यदि तुम स्वयं के भीतर लड़ रहे हो । तो कैसे विश्राम को उपलब्ध होओगे ?
पूरी की पूरी मनुष्यता । अब तक स्किजोफ्रेनिक ढंग से । खंडित मानसिकता में जीती रही है । प्रत्येक व्यक्ति टुकड़ों में । खंडों में तोड़ दिया गया है । तुम्हारे धर्म । तुम्हारे दर्शनशास्त्र । तुम्हारे सिद्धांत । घाव भरने वाले नहीं । वरन घाव करने के साधन रहे हैं । वे अंतर्युद्ध । और संघर्ष के कारण रहे हैं । तुम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे हो । तुम्हारा दायां हाथ । बाएं हाथ को चोट पहुंचाता है । बायां हाथ । दाएं हाथ को घायल करता है । और अंतत: तुम्हारे दोनों हाथ लहूलुहान हो जाते हैं ।
पश्चिम ने चार्वाक को चुना । जोरबा को चुना । विक्षिप्तता से बचने का दूसरा रास्ता न था । 1 हिस्से को पूर्णतः नष्ट करना पड़ा । पश्चिम ने मनुष्य के आंतरिक सत्य को । उसकी चेतना को अस्वीकार कर दिया । आदमी केवल body है । कहीं कोई soul नहीं है । खाओ । पीओ । और मौज करो । बस यही 1 मात्र धर्म है । यह मन की शांति पाने का 1 उपाय था । संघर्ष से बाहर आने का । 1 निर्णय और निष्कर्ष पर पहुंचने का । क्योंकि यह स्वीकृत हो गया कि तुम 1 हो । केवल matter । केवल body ।
ऊपर ऊपर से देखो । तो ऐसा लगता है कि पूरब और पश्चिम अलग अलग चीजें कर रहे हैं । किंतु गहराई से समझो । तो वे 1 ही चीज कर रहे हैं । सचाई यह है कि वे 1 होने का बौद्धिक रूप से प्रयास कर रहे हैं । क्योंकि 2 होने का मतलब है । निरंतर बेचैनी में । सतत संघर्ष में होना । इससे बेहतर है कि - दूसरे का ख्याल ही भूल जाओ ।
इसी संदर्भ में । तुम्हें यह स्मरण दिलाना महत्वपूर्ण होगा कि आधुनिक विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि matter का होना 1 भ्रम है । पदार्थ का अस्तित्व नहीं है । वह केवल दिखाई देता है । वे इस निष्पत्ति पर 1 बिलकुल भिन्न मार्ग से पहुंचे हैं । पदार्थ का सूक्ष्म अन्वेषण करते हुए उन्होंने पाया कि जैसे जैसे पदार्थ में गहरे जाते हैं । वैसे वैसे उसकी भौतिकता । उसका पदार्थ पन कम से कम होता जाता है । और परमाणु के बाद 1 ऐसा बिंदु आता है । जहां कोई पदार्थ नहीं बचता । सिर्फ इलेक्ट्रॉन रह जाते हैं । जो विद्युत कण हैं । वे पदार्थ नहीं । सिर्फ ऊर्जा तरंगें हैं ।
पश्चिमी प्रतिभा को केवल matter के साथ काम करने की छूट थी । east में प्रतिभा के लिए । पहली चुनौती थी - अंतर्यात्रा । सिर्फ द्वितीय श्रेणी के लोगों ने । मध्यम कोटि के लोगों ने । बाहरी सांसारिक चीजों के लिए श्रम किया । जो वास्तव में बुद्धिमान थे । उन्होंने सदा ध्यान की दिशा में गति की ।
धीरे धीरे दूरी बढ़ती गई । पश्चिम भौतिकवादी हो गया । इसकी पूरी जिम्मेवारी ईसाई church की है । और पूर्वीय मनुष्यता अधिक से अधिक अध्यात्मवादी हो गई । प्रत्येक व्यक्ति में जो विभाजन । जो विखंडन किया गया था । वही विस्तृत पैमाने पर पूरब और पश्चिम का विभाजन बन गया ।
1 महान कवि ने लिखा है । पूरब पूरब है । और पश्चिम पश्चिम है । और दोनों कभी नहीं मिलेंगे । और इस कवि रुडयार्ड किपलिंग की पूरब में अत्यधिक रुचि थी । वह कई वर्षों तक india में रहा । वह सरकारी नौकरी में था । पर इस भेद को देखकर कि संपूर्ण पूर्वीय चेतना भीतर गति करती है । और पश्चिमी चेतना बहिर्मुखी है । वे कैसे मिल सकते हैं ?
मेरा पूरा काम रुडयार्ड किपलिंग को गलत सिद्ध करना है । मैं कहना चाहूंगा कि न पश्चिम पश्चिम है । न पूरब पूरब है । वे दोनों पहले से ही मिले हुए हैं । न कोई पूरब है । न कोई पश्चिम है । उनके दृष्टिकोण बहुत भिन्न रहे । लेकिन वे समझे जा सकते हैं ।
मेरी दृष्टि यह है । मेरा सारा प्रयास यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर 1 सेतु निर्मित हो । ताकि तुम 1 हो जाओ । पूर्ण हो जाओ । body से दुश्मनी न करो । वह तुम्हारा घर है । अपनी soul से शत्रुता न साधो । क्योंकि बिना चेतना के हो सकता है । तुम्हारा घर खूब सजा धजा हो । पर वह खाली मकान होगा । बिना मालिक के सूना । body और soul जब साथ साथ हों । तो 1 सौंदर्य पैदा होता है । 1 पूर्ण जीवन । 1 भरा पूरा जीवन ।
प्रतीक रूप में मैंने body के लिए जोरबा को और soul के लिए बुद्ध को चुना है । चाहे मैं जोरबा के विषय में कहूं । या बुद्ध के बारे में बोलूं । मेरे प्रत्येक वक्तव्य में । वे दोनों ही स्वतः समाहित हो जाते हैं । क्योंकि मेरे लिए वे अभिन्न हैं । यह सिर्फ बल देने की बात है कि किस पर ज्यादा जोर देना है ।
जोरबा केवल शुरुआत है । यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो । तो तुम्हें कुछ बेहतर । कुछ उच्चतर । कुछ महत्तर । सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा । वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता । वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा । क्योंकि वे छोटे छोटे । क्षुद्र अनुभव । उकताने वाले हो जाएंगे । गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए । क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे । पूरब ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि 29 वर्षों तक बुद्ध इस तरह जीए । जैसा कोई जोरबा कभी न जीया होगा ।
बुद्ध के father ने पूरे राज्य की सारी सुंदर लड़कियों को एकत्रित करके बुद्ध के भोगविलास की व्यवस्था की थी । उन्होंने भिन्न भिन्न ऋतुओं के लिए । अलग अलग जगहों पर । 3 शानदार महल बनवाए । उनके पास सुंदर बाग बगीचे और झीलें थीं । बुद्ध का पूरा जीवन सुख सुविधा संपन्न था । शुद्ध भोग विलास था  । पर उससे वे उकता गए । और यह प्रश्न उनके मन में महत्वपूर्ण होने लगा कि क्या यही सब कुछ है ? फिर मैं कल के लिए क्यों जिये जा रहा हूं । जीवन का कुछ अर्थ । कुछ और अभिप्राय होना चाहिए । अन्यथा जीवन सारहीन है ।
बुद्धत्व की खोज प्रारंभ होती है । जोरबा को भरपूर जी लेने से । हर आदमी बुद्ध नहीं हो पाता । उसका मूल कारण है कि जोरबा अनजीया रह जाता है । मेरा तर्क देखते हो न । मैं कहता हूं कि जोरबा को जी भर के । पूर्णता से जी लो । तो तुम स्वाभाविक ढंग से । बुद्ध के जीवन में प्रवेश कर जाओगे ।
अपने body का सुख लो । अपने पार्थिव अस्तित्व को भोगो । इसमें कोई पाप नहीं है । इसके पर्दे में । इसके पीछे छिपा है । तुम्हारा आध्यात्मिक विकास । तुम्हारा आत्मिक आनंद । जब तुम भौतिक सुखों से थक जाओगे । केवल तब तुम पूछोगे । क्या इसके अतिरिक्त कुछ और भी है ? स्मरण रहे । यह प्रश्न मात्र बुद्धिगत नहीं हो सकता । इसे अस्तित्वगत होना पड़ेगा । क्या कुछ और भी है ? जब यह प्रश्न अस्तित्वगत होगा । तभी तुम अपने भीतर वह कुछ और उपलब्ध कर पाओगे ।
निश्चित ही बहुत कुछ और भी है  । जोरबा तो केवल शुरुआत है । 1 बार बुद्धत्व की ज्योति जल जाए । जागरण की आभा तुम्हारी आत्मा पर फैल जाए । तब तुम जानोगे कि सांसारिक सुख छाया भी न था । वहां इतना अधिक आनंद है । परमानंद  । लेकिन वह आनंद सुख के विपरीत नहीं है । वस्तुतः वह सुख ही है । जो तुम्हें इस आनंद तक ले आया है । जोरबा और बुद्ध के बीच में कोई संघर्ष नहीं है । कोई झगड़ा नहीं है । जोरबा तीर का निशान है । 1 संकेत चीन है । यदि तुम उस दिशा में ठीक से अनुसरण करो । तो बुद्ध तक पहुंच जाओगे । ओशो । बियांड एनलाइटनमेंट । 

99% मनोवैज्ञानिक समस्याएं मानव के sex के दमन से पैदा होती हैं ।

ऐसा लगता है कि दुनिया दिन पर दिन अधिक से अधिक पागल होती जा रही है । कोई नहीं जानता कि क्या हो रहा है ? और हर चीज उलटी सीधी । और गड़बड़ हो गई है । यह बात अखबार कहते हैं । क्या यह सच है ? और यदि ऐसा है । तो क्या जीवन में कोई आत्यंतिक संतुलन है । जो हर चीज को स्थिर रखे हुए है ?
दुनिया वैसी ही है । यह हमेशा ऐसी ही रही है । उलटी । पागल । विक्षिप्त । सच तो यह है कि सिर्फ 1 नई बात दुनिया में हुई है । और वह यह होश कि हम पागल हैं कि हम उलटे हैं कि हममें कुछ मौलिक गलती है । और यह महान आशीर्वाद है - यह होश । निश्चित ही यह शुरुआत है । 1 लंबी प्रक्रिया का सिर्फ क ख ग । सिर्फ बीज । लेकिन बहुत अर्थपूर्ण । दुनिया अपने विक्षिप्त ढंगों के प्रति कभी भी सचेत नहीं थी । जितनी कि आज है । यह हमेशा ऐसी ही रही है । 3000 सालों में मानव ने 5000 युद्ध किए । क्या तुम कह सकते हो कि मानवता स्वस्थ रही है ? कोई मानवता के इतिहास में यह याद भी नहीं कर सकता कि कोई ऐसा समय रहा हो । जब लोग 1 - दूसरे को धर्म के नाम पर । या परमात्मा के नाम पर । या शांति । मानवता । वैश्विक भाईचारे के नाम पर नष्ट न करते रहे हों । बड़े बड़े शब्दों के पीछे कुरूप असलियत छिपी है । ईसाई मुसलमानों की हत्या करते रहे । मुसलमान ईसाइयों की हत्या करते रहे । मुसलमान हिंदुओं की हत्या करते रहे । हिंदु मुसलमानों की हत्या करते रहे । राजनैतिक विचारधाराएं । धार्मिक विचारधाराएं । दार्शनिक विचारधाराएं । हत्याओं के लिए मुखौटे रहे हैं । हत्या को उचित ठहराने का ढंग । और ये सारे religion लोगों से वादा कर रहे थे कि यदि तुम धर्मयुद्ध में मारे जाते हो । तो तुम्हारा स्वर्ग निश्चित है । युद्ध में हत्या करना पाप नहीं है । युद्ध में मारा जाना बहुत बड़ा पुण्य है । यह निरी मूर्खता है । लेकिन 10 हजार सालों के संस्कार मानवता के खून में । हड्डियों में । मज्जा में गहरे चले गए हैं ।
हर धर्म । हर देश । हर वर्ग । दावा कर रहा था - हम परमात्मा के चुने हुए लोग हैं । हम श्रेष्ठ हैं । सभी हम से नीचे हैं । यह पागलपन है । और इसके कारण सभी ने दुख झेला । हर बच्चा स्वस्थ चित्त पैदा होता है । और धीरे धीरे हम उसे सभ्य बनाते हैं । हम इसे सभ्य बनाने की प्रक्रिया कहते हैं । हम उसे महान संस्कृति । महान चर्च । वह महान राज्य । जिसमें वह रहता है । उसका हिस्सा बनने के लिए तैयार करते हैं । हमारी सारी राजनीति मूर्खतापूर्ण है । और तब वह मूर्ख बन जाता है । हमारी सारी शिक्षा भद्दी है । हमारी राजनीति और कुछ नहीं बस महत्वाकांक्षा है । नंगी महत्वाकांक्षा । ताकत की महत्वाकांक्षा । और सिर्फ शूद्रतम लोग ताकत में रुचि रखते हैं । सिर्फ वे लोग जो गहरी आत्महीनता की ग्रथि से पीड़ित हैं । वे ही राजनेता बनते हैं । वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि वे हीन नहीं हैं । वे दूसरों के सामने सिद्ध करना चाहते हैं । वे स्वयं के सामने सिद्ध करना चाहते हैं कि वे हीन नहीं हैं । वे श्रेष्ठ हैं ।
राजनेता विक्षिप्त हैं । लेकिन हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि वे राजनेता बनें । हम अपने बच्चों को वही संस्कृति सिखाते हैं । जिसने हमें दुख दिया । वही मूल्य । जो हमारी छाती पर बोझ बने हुए हैं । जो सिर्फ सूक्ष्म जंजीरें सिद्ध हुए हैं । कैदखाने । लेकिन हम अपने बच्चों को संस्कारित किए चले जाते हैं । उसी शिक्षा ने जिसने हमारे प्रसाद । हमारी निर्दोषता को नष्ट कर दिया । हम वही शिक्षा हमारे बच्चों को सिर में ठूंसते चले जाते हैं । और हम अपने बच्चों से झूठ बोलते चले जाते हैं । जैसे कि हमारे माता पिता हमारे से झूठ बोलते रहे ।
और यह सदियों से चला आ रहा है । मानवता कैसे स्वस्थ । ठीक । विश्रांत हो सकती है ? इसका पागल होना तय है । जरा देखो कि तुम कैसे अपने बच्चों से झूठ बोले चले जा रहे हो ।
पहली बार । मानवता के संपूर्ण इतिहास में । कुछ लोग । इस बात को लेकर सचेत हुए हैं कि हम अभी तक गलत ढंग से बने रहे हैं । कुछ मूल बात हमारी बुनियाद में ही चूक रही है । कुछ है । जो हमें स्वस्थ मानव नहीं बनने देती । हमारे संस्कारों में विक्षिप्तता के बीज हैं । लेकिन आज 1 बात अच्छी हो रही है । कम से कम थोड़े से युवा लोग इस बात को लेकर सचेत हो रहे हैं कि हमारा सारा अतीत गलत रहा है । और इसे संपूर्ण बदलाव की जरूरत है - हमें अतीत से सातत्य तोड़ने की जरूरत है । हमें ताजा शुरुआत करने की जरूरत है । सारे अतीत का प्रयोग पूरी तरह से असफल हो गया !
1 बार हम सत्य जैसा है । वैसा स्वीकार लेते हैं । तो मानव स्वस्थ हो सकता है । मानव जन्मजात स्वस्थ है । हम उसे पागल बना देते हैं । 1 बार हम स्वीकार लें कि यहां कोई country और कोई वर्ग नहीं है । मानव शांत और मौन हो जाएगा । ये सारी हिंसा और आक्रामकता विदा हो जाएगी । यदि हम मानव के शरीर । उसकी कामुकता । उसकी स्वाभाविकता को स्वीकार लें । तो religion के नाम पर सब तरह के मूर्खताएं सिखाई जाती हैं । वे वाष्पीभूत हो जाएगी । 99% मनोवैज्ञानिक समस्याएं मानव के sex के दमन से पैदा होती हैं ।
हमें मानव को अतीत से मुक्त करना है । यहां मेरा सारा कार्य यही है । तुम्हें अतीत से मुक्त करने में सहायक होऊं । समाज ने जो कुछ भी तुम्हारे साथ किया है । उसे अनकिया करना है । तुम्हारी चेतना साफ होनी चाहिए । रिक्त । ताकि तुम साफ आईने की तरह हो सको । जो वास्तविकता को प्रतिबिंबित करता है । वास्तविकता को प्रतिबिंबित करने में योग्य होना । god को जान लेना है । वास्तविकता का दूसरा नाम god  है । वह जो है । और मानव सचमुच स्वस्थ तब होता है । जब वह सत्य को जान लेता है ।
सत्य मुक्ति लाता है । सत्य विवेक लाता है । सत्य ज्ञान लाता है । सत्य निर्दोषता लाता है । सत्य आनंद लाता है । सत्य उत्सव लाता है । हमें इस सारी पृथ्वी को महानतम उत्सव में बदलना है । और यह संभव है । क्योंकि मानव वह सब कुछ ले आया है । जो इस पृथ्वी को स्वर्ग में बदल सकता है । ओशो । कम । कम । येट अगेन कम ।

बहुत दे दिया धोखा स्वयं को अब और नहीं

मैं यहां तुम्हें स्वपन देने के लिये नहीं हूं । बल्कि बिलकुल इसके विपरीत । मैं यहां तुम्हारे स्वपनों को धवस्त करने के लिये हूं । तुम मेरे बारे यह नहीं कह सकते कि मैं सही हूं । या ग़लत । अधिक से अधिक तुम यही कह सकते हो कि मैं उलझन पैदा कर रहा हूं । लेकिन यही मेरा उपाय है । तुम्हें उलझा दूं । कहां तक तुम यह सह सकोगे कि मैं यहां से वहां । और वहां से यहां बदलता रहूं । 1 दिन तुम चिल्लाने ही वाले हो । दूर रहो । अब निर्णय मैं लूंगा ।  मैं कोई गंभीर कार्य नहीं कर रहा । मैं कार्य कर ही नहीं रहा । यह मेरी मौज है । जो मैं तुमसे बांट रहा हूं । अब तुम इसके साथ क्या करते हो । यह तुम्हारी समस्या है । मेरी नहीं । मेरी देशना है कि अतीत से संपूर्ण संबंध विच्छेद हो । मैं चाहता हूं कि पहले तुम ज़ोरबा की भांति जियो । उस नींव पर ही तुम्हारे बुद्धत्व का मंदिर निर्मित होगा । इस तरह हम बाहर और भीतर को एक ही सूत्र में पिरो देंगे । बाहर भी उतना ही तुम्हारा है । जितना भीतर । मैं तुम्हें यहां हिन्दू । mussalman या ईसाई बनाने के लिये नहीं । वह सब बकवास मेरे लिये नहीं । मैं यहां तुम्हें धार्मिक होने में मदद करने के लिये हूं । बिना किसी विशेषण के । और एक बार तुम इसे समझ लो । तो पूरा संसार एक नये रंग में रंग जाता है । मैं कोई कारण नहीं देखता कि भीतर और बाहर में विभाजन किया जाये । मैं गरीब रहा हूं ।  मैनें अत्यंत गरीबी देखी है । और मैं अमीरी में भी जिया हूं । मेरी मानों । समृद्धि दरिद्रता से कहीं बेहतर है । मैं अत्यंत सरल अभिरुचियों का व्यक्ति हूं ।  मैं किसी भी श्रेष्टतम से संतुष्ट हूं ।  मैं अधिक नहीं चाहता । मैं तुम्हारे किये कुछ कर नहीं रहा हूं । क्योंकि वह भी एक प्रकार का अहंकार है । कोई भी यह सोचे कि वह तुम्हारे लिये कुछ कर रहा है । यह बस घट रहा है ।
मैं कोई विचार नहीं हूं । और न ही मैं कहीं अटका हूं । मैं प्रवाह में हूं । मैं हैराक्लिटस से सहमत हूं कि तुम एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते । यदि अनुवाद किया जाए । तो इसका अर्थ हुआ । तुम एक ही व्यक्ति को दोबारा नहीं मिल सकते । मैं उससे सहमत ही नहीं हूं । बल्कि एक कदम आगे जाता हूं कि एक ही नदी में तुम एक बार भी नहीं उतर सकते । मनुष्य के संसार में यदि इसका अनुवाद किया जाए । तो अर्थ यह हुआ कि तुम एक ही व्यक्ति को । एक बार भी नहीं मिल सकते । क्योंकि एक बार भी जब तुम उसे मिल रहे हो । तो वह बदल रहा है । तुम बदल रहे हो । संपूर्ण संसार बदल रहा है । मैं यहां किन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिये नहीं । अपितु तुम्हारे भीतर एक विशिष्ट गुणवत्ता पैदा करने के लिये हूं । मैं तुम्हें कुछ समझाने के लिये नहीं बोल रहा । मेरा बोलना बस एक सृजनात्मक घटना है ।  मेरा बोलना । तुम्हें कुछ समझाने का प्रयास नहीं । वह तो तुम किताबों से भी समझ सकते हो । और इसके अतिरिक्त लाखों अन्य तरीकों द्वारा यह संभव है । मैं तो यहां केवल तुम्हें रूपांतरित करने के लिये हूं ।
मैं एक साधारण व्यक्ति हूं । मेरे पास कोई करिश्मा नहीं । और मैं करिश्मे में विश्वास नहीं करता ।  मैं पद्धतियों में विश्वास नहीं करता । भले ही मैं उनका इस्तेमाल करता हूं । लेकिन मैं उन पर विश्वास नहीं करता । मैं एक साधारण व्यक्ति हूं । बहुत आम । मैं भीड़ में खो सकता हूं । और तुम कभी मुझे ढूंढ न पाओगे । मैं तुम्हारे आगे नहीं  साथ चलता हूं । मैं बेरोज़गार हूं । मैं कुछ भी नहीं कर रहा । सब इच्छाएं मिट गईं हैं । सब करना तिरोहित हो गया है । मैं बस यहां हूं । तुम्हारे लिये मैं बस एक अस्तित्व हूं । यदि तुम मुझे प्रेम करते हो । तो तुम मेरा उत्साह से स्वागत करोगे । और तुम्हें अत्यंत लाभ होगा । यदि तुम मुझे घृणा करते हो । तो तुम चूक जाओगे । और ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी । अब चुनाव तुम्हारा है । लेकिन मैं कुछ नहीं कर रहा ।
मेरा पूरा प्रयास । एक नयी शुरुआत करने का है । इससे विश्व भर में मेरी आलोचना निश्चित है । लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । परवाह किसे है । गौतम बुद्ध अतीत के सब गुरुओं का प्रतिरूप हैं । शिष्य को दूर रखना होगा । उसे अनुशासन  समादर और आज्ञापालन सीखना होगा । यह एक प्रकार से आध्यात्मिक ग़ुलामी हुई । मैं नहीं चाहता कि तुम मेरे गुलाम बनो । और मैं नहीं चाहता कि तुम मेरा आज्ञा पालन करो । मैं सिर्फ यह चाहता हूं कि तुम तुम मुझे समझो । और यदि मेरा अनुभव प्रमाणिक है । और तुम्हारा विवेक उसे समझ पाता है । तो तुम स्वयं ही उसका अनुसरण करोगे । यह आज्ञा पालन न हुआ । मैं तुम्हें कुछ करने को नहीं कह रहा । मैं सिर्फ तुम्हें समझने के लिये कह रहा हूं । और फिर तुम्हारा विवेक जहां तुम्हें ले जाये ।  तुम उसका अनुसरण करो । तुम जो भी बनो । मैं प्रसन्न हूं । बस स्वयं के साथ सच्चे और ईमानदार रहो ।  मैं तुम्हें लुभा रहा हूं । ताकि तुम जीवन के प्रति प्रेमपूर्ण हो सको । थोड़ा और काव्यमयी हो सको । तुम तुच्छ व साधारण के प्रति उदासीन हो सको । ताकि तुम्हारे जीवन में उदात्त का विस्फोट हो जाए ।
मुझे एक उद्धारक की तरह न देखें । इस विचार के कारण ही कि कोई उद्धारक आ गया है । कोई मसीहा आ गया है । लोग वैसे ही जीते रहते हैं । जैसे वे जीते रहे हैं । वे क्या कर सकते हैं ? उनका कहना है कि सब कुछ तभी होगा । जब कोई मसीहा आयेगा । यह उनका ढंग है । रूपांतरण को टालने का । यह उनका ढंग है । स्वयं को धोखा देने का । बहुत हो चुका । बहुत दे दिया । धोखा स्वयं को । अब और नहीं । कोई मसीहा नहीं आने वाला । तुम्हें स्वयं कार्य करना होगा । तुम्हें स्वयं के प्रति । अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी । और जब तुम ज़िम्मेदार होते हो । तो सब कुछ स्वयं घटने लगता है । मैं चाहता हूं कि जो भी बाहर उपलब्ध है । लोग उसके साथ सहजता से जियें । जल्दी न करें । क्योंकि जो भी अनजिया रह गया । तुम्हें वापस खींचेगा । इसे खत्म करें । और तब तुम्हें अपने घर से । या अपने बैंक के खाते से भागना न पड़ेगा ।  क्योंकि वे फिर तुम पर बोझ न रहेंगे । उनका कोई अर्थ ही न रह जायेगा । संभव है । उनका कोई उपयोग हो सके । लेकिन उनमें कोई ग़लती नहीं । ओशो ।

सत्य को जानना है तो अपनी बुद्धि के कुओं से बाहर आ जाओ

साधारण आदमी जब उसके जीवन में दुख आता है । तब शिकायत करता है । सुख आता है । तब धन्यवाद नहीं देता । जब दुख आता है । तब वह कहता है कि - कहीं कुछ भूल हो रही है । god नाराज है । भाग्य विपरीत है । और जब सुख आता है । तब वह कहता है कि - यह मेरी विजय है ।
मुल्ला नसरुद्दीन 1 प्रदर्शनी में गया । अपने विद्यार्थियों को साथ लेकर । उस प्रदर्शनी में 1 जुए का खेल चल रहा था । लोग तीर चला रहे थे  धनुष से । और 1 निशाने पर चोट मार रहे थे । निशाने पर चोट लग जाये । तो जितना दांव पर लगाते थे । उससे 10 गुना उन्हें मिल जाता था । निशाने पर चोट न लगे । तो जो उन्होंने दांव पर लगाया । वह खो जाता । nasruddin अपने student के साथ पहुँचा । उसने अपनी टोपी सम्हाली । धनुष बाण उठाया ।  दांव लगाया । और पहला तीर छोड़ा । तीर पहुंचा ही नहीं निशान तक । लगने की बात दूर । वह कोई 10-15 फीट पहले गिर गया । लोग हंसने लगे । नसरुद्दीन ने अपने विद्यार्थियों से कहा - इन नासमझों की हंसी की फिक्र मत करो । अब तुम्हें समझाता हूं कि - तीर क्यों गिरा ।  लोग भी चौंककर खड़े हो गये । वह जो जुआ खिलाने वाला था । वह भी चौंककर रह गया । बात ही भूल गया । नसरुद्दीन ने कहा - देखो  यह उस, सिपाही का तीर है । जिसको आत्मा पर भरोसा नहीं । जिसको आत्मविश्वास नहीं । वह पहुंचता ही नहीं है -लक्ष्य तक ।  पहले ही गिर जाता है । अब तुम दूसरा तीर देखो ।
 सभी लोग उत्सुक हो गये । उसने दूसरी तीर प्रत्यंचा पर रखा । और तेजी से चलाया । वह तीर निशान से बहुत आगे गया । इस बार लोग हंसे नहीं । नसरुद्दीन ने कहा - देखो यह उस आदमी का तीर है । जो जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा हुआ है ।
और तब उसने तीसरा तीर उठाया । और संयोग की बात कि वह जाकर निशान से लग गया । nasruddin ने जाकर अपना दांव उठाया । और कहा - 10 गुने रुपये दो ।
भीड़ में थोड़ी फुसुसाहट हुई । और लोगों ने पूछा - और यह किसका तीर है ? नसरुद्दीन ने कहा - यह मेरा तीर है । पहला तीर उस सिपाही का था । जिसको आत्मविश्वास नहीं है । दूसरा  उस सिपाही का था । जिसको ज्यादा आत्मविश्वास है । और तीसरा-जो लग गया । वह मेरा तीर है ।
यही साधारण मनोदशा है । जब तीर लग जाये । तो तुम्हारा ।  चूक जाये । तो कोई और जिम्मेवार है । और जब तुम किसी को जिम्मेवार न खोज सको । तो god जिम्मेवार है । जब तक तुम दृश्य जगत में किसी को जिम्मेदार खोज लेते हो । तब तक अपने दुख उस पर डाल देते हो । अगर दृश्य जगत में तुम्हें कोई जिम्मेवार न दिखाई पड़े । तब भी तुम जिम्मेवारी अपने कंधे पर तो नहीं ले सकते । तब god तुम्हारे काम आता है । वह तुम्हारे बोझ को अपने कंधे पर ढोता है ।
तुमने परमात्मा को अपने दुखों से ढांक दिया है । अगर वह दिखाई नहीं पड़ता है । तो हो सकता है । सबने मिलकर इतने दुख उस पर ढांक दिये हैं कि - वह ढंक गया है । और उसे खोजना मुश्किल है ।
शब्दों या शास्त्रों की सीमा में सत्य नहीं है । असल में जहां सीमा है । वहीं सत्य नहीं है । सत्य तो असीम है । उसे जानने को बुद्धि और विचारों की परिधि को तोड़ना आवश्यक है । असीम होकर ही असीम को जाना जाता है । विचार के घेरे से मुक्त होते ही चेतना असीम हो जाती है । वैसे ही जैसे मिट्टी के घड़े को फोड़ दें । तो उसके भीतर का आकाश असीम आकाश से 1 हो जाता है ।
सूर्य आकाश के मध्य में आ गया था । 1 सुंदर हंस 1 सागर से दूसरे सागर की ओर उड़ा जा रहा था । लंबी यात्रा और धूप की थकान से वह भूमि पर उतरकर 1 कुएं की पाट पर विश्राम करने लगा । वह बैठ भी नहीं पाया था कि कुएं के भीतर से 1 मेंढक की आवाज आयी - मित्र who are you और कहां से आए हो ?  वह हंस बोला - मैं एक अत्यंत दरिद्र हंस हूँ । और सागर पर मेरा निवास है ।  मेंढक का सागर से परिचित व्यक्ति से पहला ही मिलन था । वह पूछने लगा - सागर कितना बड़ा है ?  हंस ने कहा - असीम । इस पर मेंढक ने पानी में 1 छलांग लगाई । और पूछा - क्या इतना बड़ा ?
वह हंस हंसने लगा । और बोला - प्यारे मेंढक । नहीं । सागर इससे अनंत गुना बड़ा है । इस पर मेंढक ने 1 और बड़ी छलांग लगाई । और पूछा - क्या इतना बड़ा ? उत्तर फिर भी नकारात्मक पाकर मेंढक ने कुएं की पूर्ण परिधि में कूदकर चक्कर लगाया और पूछा - अब तो ठीक है  । सागर इससे बड़ा और क्या होगा ? उसकी आंखों में विश्वास की झलक थी । और इस बार उत्तर के नकारात्मक होने की उसे कोई आशा न थी । लेकिन उस हंस ने पुन: कहा - नहीं मित्र ! नहीं तुम्हारे कुएं से सागर को मापने का कोई उपाय नहीं है । इस पर मेंढक तिरस्कार से हंसने लगा । और बोला - महानुभाव ! असत्य की भी सीमा होती है ?  मेरे संसार से बड़ा सागर कभी भी नहीं हो सकता ।
मैं सत्य के खोजियों से क्या कहता हूं । कहता हूं - सत्य के सागर को जानना है । तो अपनी बुद्धि के कुओं से बाहर आ जाओ । बुद्धि से सत्य को पाने का कोई उपाय नहीं । वह अमाप है । उसे तो वही पाता है । जो स्वयं के सब बांध तोड़ देता है । उनके कारण ही बाधा है । उनके मिटते ही सत्य जाना ही नहीं जाता । वरन उससे एक्य हो जाता है । उससे 1 हो जाना ही उसे जानना है । 

उसने कहा - मैं मौत हूँ

मैंने सुना है कि 1 गांव के बाहर 1 फकीर रहता था । 1 रात उसने देखा कि 1 काली छाया गांव में प्रवेश कर रही है । उसने पूछा कि - तुम कौन हो ? उसने कहा - मैं मौत हूँ । और शहर में महामारी फैलने वाली है । इसीलिये मैं जा रही हूं । 1000 आदमी मरने है । बहुत काम है । मैं रूक न सकूँगी । महीने भर में शहर में 10000 आदमी मर गये । फकीर ने सोचा । हद हो गई झूठ की । मौत खुद ही झूठ बोल रही है । हम तो सोचते थे कि आदमी ही बेईमान है । ये तो देखो मौत भी बेईमान हो गई । कहा 1000 और मार दिये 10000 । मौत जब 1 महीने बाद आई । तो फकीर ने पूछा कि तुम तो कहती थी 1000 आदमी ही मारने है । 10000 आदमी मर चुके । और अभी मरने ही जा रहे है ।
उस मौत ने कहा । मैंने तो 1000 ही मारे हैं । 9000 तो घबराकर मर गये हैं । मैं तो आज जा रही हूं । और पीछे से जो लोग मरेंगे । उनसे मेरा कोई संबंध नहीं होगा । और देखना । अभी भी शायद इतने ही मेरे जाने के बाद मर जाए । वह खुद मर रहे है । यह आत्‍महत्या है । जो आदमी भरोसा करके मर जाता है । यदि मर गया । वह भी आत्‍महत्या हो गयी । ऐसी आत्‍महत्‍याओं पर मंत्र काम कर सकते है । ताबीज काम कर सकते है । राख काम कर सकती है । उसमें संत वंत को कोई लेना देना नहीं है । अब हमें पता चल गया है कि उसकी मानसिक तरकीबें है । तो ऐसे अंधे है ।
सुना है मैंने । 1 घर में 2 वर्ष से 1 आदमी लक़वे से परेशान है । उठ नहीं सकता है । न हिल ही सकता है । सवाल ही नहीं है उठने का । सूख गया है । 1 रात । आधी रात । घर में आग लग गयी है । सारे लोग घर के बाहर पहुंच गये । पर प्रमुख तो घर के भीतर ही रह गया । पर उन्‍होंने क्‍या देखा कि प्रमुख तो भागे चले आ रहे हैं । यह तो बिलकुल चमत्‍कार हो गया । आग की बात तो भूल ही गये । देखा ये तो गजब हो गया । लकवा जिसको 2 साल से लगा हुआ था । वह भागा चला आ रहा है । अरे आप चल कैसे सकते है । और वह वहीं वापस गिर गया । मैं चल ही नहीं सकता ।
अभी लक़वे के मरीजों पर सैकड़ों प्रयोग किये गये । लक़वे के मरीज को हिप्नोटाइज करके । बेहोश करके । चलवाया जा सकता है । और वह चलता है । तो उसका शरीर तो कोई गड़बड़ नहीं करता । बेहोशी में चलता है । और होश में नहीं चल पाता । चलता है । चाहे बेहोशी में ही क्‍यों न चलता हो । 1 बात का तो सबूत है कि उसके अंगों में कोई खराबी नहीं है । क्‍योंकि बेहोशी में अंग कैसे काम कर रहे है । अगर खराब हो । लेकिन होश में आकर वह गिर जाता है । तो इसका मतलब साफ है ।
बहुत से बहरे है । जो झूठे बहरे है । इसका मतलब यह नहीं है कि उनको पता नहीं है । क्‍योंकि अचेतन मन ने उनको बहरा बना दिया है । बेहोशी में सुनते है । होश में बहरे हो जाते है । ये सब बीमारियाँ ठीक हो सकती है । लेकिन इसमें चमत्कार कुछ भी नहीं है । चमत्‍कार नहीं है । विज्ञान जो भीतर काम कर रहा है । साइकोलाजी । वह भी पूरी तरह स्‍पष्‍ट नहीं है । आज नहीं कल । पूरी तरह स्‍पष्‍ट हो जायेगा ।
आप 1 साधु के पास गये । उसने आपको देखकर कह दिया । आपका फलां नाम है ? आप फलां गांव से आ रहे है । बस आप चमत्‍कृत हो गये । हद हो गयी । कैसे पता चला । मेरा गांव । मेरा नाम । मेरा घर ? क्‍योंकि टेलीपैथी अभी अविकसित विज्ञान है ।  बुनियादी सुत्र प्रगट हो चुके है । अभी दूसरे के मन के विचार को पढ़ने कि साइंस धीरे धीरे विकसित हो रही है । और साफ हुई जा रही है । उसका सबूत है । कुछ लेना देना नहीं है । कोई भी पढ़ सकेगा । कल जब साइंस हो जायेगी । कोई भी पढ़ सकेगा । अभी भी काम हुआ है । और दूसरे के विचार को पढ़ने में बड़ी आसानी हो गयी है । छोटी सी तरकीब आपको बता दूँ । आप भी पढ़ सकते है । एक दो चार दिन प्रयोग करें । तो आपको पता चल जायेगा । और आप पढ सकते है । लेकिन जब आप खेल देखेंगे । तो आप समझेंगे कि भारी चमत्‍कार हो रहा है ।
1 छोटे बच्‍चे को लेकर बैठ जायें । रात अँधेरा कर लें । कमरे में । उसको दूर कोने में बैठा लें । आप यहां बैठ जायें । और उस बच्‍चे से कह दें कि हमारी तरफ ध्‍यान रख । और सुनने की कोशिश कर । हम कुछ न कुछ कहने की कोशिश कर रहे है । और अपने मन में एक ही शब्‍द ले लें । और उसको जोर से दोहरायें । अंदर ही दोहरायें । गुलाब । गुलाब को जोर से दोहरायें । गुलाब । गुलाब । गुलाब दोहरायें । आवाज में नहीं । मन में जोर से । आप देखेंगे कि 3 दिन में बच्‍चे ने पकड़ना शुरू कर दिया । वह वहां से कहेगा । क्‍या आप गुलाब कह रहे है । तब आपको पता चलेगा कि बात क्‍या हो गयी ।
जब आप भीतर जोर से गुलाब दोहराते है । तो दूसरे तक उसकी विचार तरंगें पहुंचनी शुरू हो जाती है । बस वह जरा सा रिसेप्‍टिव होने की कला सीखने की बात है । बच्‍चे रिसेप्‍टिव है । फिर इससे उलट भी किया जा सकता है । बच्‍चे को कहे कि वह 1 शब्‍द मन में दोहरायें । और आप उसे तरफ ध्‍यान रखकर । बैठकर पकड़ने की कोशिश करेंगें । बच्‍चा 3 दिन में पकड़ा है । तो आप 6 दिन में पकड़ सकते है । कि वह क्‍या दोहरा रहा है । और जब 1 शब्‍द पकड़ा जा सकता है । तो फिर कुछ भी पकड़ा जा सकता है ।
हर आदमी के अंदर विचार कि तरंगें मौजूद है । वह पकड़ी जा रही है । लेकिन इसका विज्ञान अभी बहुत साफ न होने की वजह से कुछ मदारी इसका उपयोग कर रह है । जिनको यह तरकीब पता है । वह कुछ उपयोग कर रहे है । फिर वह आपको दिक्‍कत में डाल देते है । यह सारी की सारी बातों में कोई चमत्‍कार नहीं है । न चमत्‍कार कभी पृथ्‍वी पर हुआ नहीं । न कभी होगा ।1000 साल गुलाम रहे थे । और यहां ऐसे चमत्‍कारी पड़े है कि जिसका कोई हिसाब नहीं । गुलामी की जंजीरें नहीं कटतीं । ऐसा लगता है कि अंग्रेजो के सामने चमत्‍कार नहीं चलता । चमत्‍कार होने के लिए हिंदुस्‍तानी होना जरूरी है । क्‍योंकि अगर खोपड़ी में थोड़ी भी विचार चलता हो । तो चमत्‍कार के कटने का डर रहता है । तो जहां विचार है । बिलकुल न चला पाओगे चमत्‍कार को । सबसे बड़ा चमत्‍कार यह है कि लोग चमत्‍कार कर रहे है । सबसे बड़ा चमत्‍कार यह है कि हम खुद भी होते हुए चमत्‍कार देख रहे हैं । और घरों में बैठकर चर्चा कर रहे हैं । कि चमत्‍कार हो रहा है । और कोई इन चमत्‍कारियों की जाकर गर्दन नहीं पकड़ लेता कि जो खो गयी है घड़ी । उसको बाहर निकलवा ले कि क्‍या मामला है । क्‍या कर रहे हो ? वह नहीं होता है ।
हम हाथ पैर जोड़कर खड़े हैं । उसका कारण है । हमारे भीतर कमजोरियाँ हैं । जब राख की पुड़िया निकलती है । तो हम सोचते है कि भई शायद और भी कुछ निकल आयें पीछे । राख की पुड़िया से कुछ होने वाला नहीं है न । आगे कुछ और संभावना बनती है । आशा बंधती है । और कोई बीमार है । किसी को नौकरी नहीं मिली है । किसी की पत्‍नी मर गई है । किसी का किसी से प्रेम है । किसी का मुकदमा चल रहा है । सबकी तकलीफें है । तो लगता है । जो आदमी ऐसा कर रहा है । अपनी तकलीफ भी कुछ कम कर रहा है । दौड़ो इसके पीछे ।
बीमारी । गरीबी । परेशानी । उलझनें कारण हैं कि हम चमत्‍कारियों के पीछे भाग रहे है । कोई धार्मिक जिज्ञासा कारण है । धार्मिक जिज्ञासा से इसका कोई संबंध नहीं है । धार्मिक जिज्ञासा से इसका क्‍या वास्‍ता । धार्मिक जिज्ञासा का क्‍या हल होगा । इन सारी बातों से । लेकिन लोग करते चले जाएंगे । क्‍योंकि हम गहरे अज्ञान में है । गहरे विश्‍वास में है । लोग कहते चले जाएंगे । और शोषण होता चला जायेगा । पुराने चित ने चमत्‍कारी पैदा किया था । लेकिन जिन जिन कौमों ने चमत्‍कारी पैदा किये । उन उन कौमों ने विज्ञान पैदा नहीं किया ।
ध्‍यान रहे । चमत्‍कारी चित वहीं पैदा हो सकता है । जहां एंटी सांइटिफिक माइंड हो । जहां विज्ञान विरोधी चित हो । जहां विज्ञान आयेगा । वहां चमत्‍कारी मरेगा । क्‍योंकि विज्ञान कहेगा । चमत्‍कार को कि हम काज़ और इफेक्‍ट में मानते है । हम मानते है । कार्य और कारण में । विज्ञान किसी चमत्‍कार को नहीं मानता है । उसने हजारों चमत्‍कार किये है । जिनमें से एक भी कोई संत कर देता । तो हम हजारों लाखों साल तक उसकी पूजा करते । अब यह पंखा चल रहा है । यह माइक आवाज कर रहा है । यह चमत्‍कार नहीं होगा । क्‍योंकि यह विज्ञान ने किया है । और विज्ञान किसी चीज को छिपाता नहीं है । सारे कार्य कारण प्रगट कर देता है । आदमी का ह्रदय बदला जा रहा है । दूसरे का ह्रदय उसके काम कर रहा है । आदमी के सारे शरीर के पार्ट बदले जा रहे है ।
आज नहीं कल । हम आदमी की स्‍मृति भी बदल सकेंगे । उसकी भी संभावना बढ़ती जा रही है । कोई जरूरी नहीं है कि एक आइंस्‍टीन माइंड वह मर ही जाये । आइंस्‍टीन मरे । मरे । उसकी स्‍मृति को बचाकर हम एक नये बच्‍चे में ट्रांस्‍पलांट कर सकते है । इतने बड़े चमत्‍कार घटित हो रहे है । लेकिन कोई नासमझ न कहेगा कि ये चमत्‍कार है । कहेगा । ऐसा चमत्‍कार क्‍या है । और कोई आदमी की फोटो में से राख झाड़ देता है । हम हाथ जोड़कर खडे हो जाते है । चमत्‍कार हो रहा है । बड़ा आश्‍चर्य है । अवैज्ञानिक विज्ञान विरोधी चित है । विज्ञान ने इतने चमत्‍कार घटित किये है कि हमें पता ही नहीं चलता । क्‍योंकि विज्ञान चमत्‍कार का दावा नहीं करता । विज्ञान खुला सत्‍य है । ओपन सीक्रेट है ।
और यह जो बेईमानों की दुनिया है यहां । इसलिए अगर किसी आदमी को कोई तरकीब पता चल जाती है । तो उसको खोलकर नहीं रख सकता । क्‍योंकि खोले तो चमत्‍कार गया । इसलिए ऐसे मुल्‍क का ज्ञान रोज बढ़ जाता है । अगर मुझे कोई चीज पता चल जाये । और चमत्‍कार करना हो । तो पहली जरूरत हो । यह है कि उसके पीछे जो राज है । उसको मैं प्रगट न करूं । आयुर्वेद ने बहुत विकास किया । लेकिन आयुर्वेद का जो वैद्य था । वह वह चमत्‍कार कर रहा था । इसलिए आयुर्वेद पिछड़ गया । नहीं तो आयुर्वेद की आज की स्‍थिति एलोपैथी से कहीं बहुत आगे होती । क्‍योंकि ऐलापैथी की खोज बहुत नयी है । आयुर्वेद की खोज बहुत पुरानी है । इसलिए एक वैद्य को जो पता है । वह अपने बेटे को भी न बातयेगा । नहीं तो चमत्‍कार गड़बड़ हो जायेगा । मजा लेना चाहता है ।
मजा लेना चाहता है । टीका । छाप लगाकर । और साफ़ा वगैरह बांधकर बैठा रहेगा । और मर जायेगा । वह जो जान लिया था । वह छिपा जायेगा । क्‍योंकि वह अगर पूरी कड़ी बता दे । तो फिर चमत्‍कार नहीं होगा । लेकिन तब साइंस बंद करनी पड़ी । हिंदुस्‍तान में कोई साइंस नही बनती । जिस आदमी को जो पता है । वह उसको छिपाकर रखता है । वह कभी उसका पता किसी को चलने नहीं देगा । क्‍योंकि पता चला कि चमत्‍कार खत्‍म हो गया । इस वजह से हमारे मुल्‍क में ज्ञान की बहुत दफे किरणें प्रगट हुई । लेकिन ज्ञान का सूरज कभी न बन पाया । क्‍योंकि एक एक किरण मर गयी । और उसे कभी हम बपौती न बना पाये कि उसे हम आगे दे सकें । उसको देने में डर है । क्‍योंकि दिया तो कम से कम उसे तो पता ही चल जायेगा कि अरे ।
एक महिला मेरे पास प्रोफसर थी । वह संस्‍कृत की प्रोफेसर थी । वह इसी तरह एक मदारी के चक्‍कर में आ गयी । जिनकी फोटो से राख गिरती है । और ताबीज निकलते है । उसने मुझसे आकर आशीर्वाद मांगा कि मैं अब जा रही हूं । सब छोड़कर । मुझे तो भगवान मिल गये है । अब कहां यहां पड़ी रहूंगी । आप मुझे आशीर्वाद दें । मैंने कहा । यह आशीर्वाद मांगना ऐसा है । जैसे कोई आये कि अब मैं जा रहा हूं । कुएं में गिरने को । और उसको मैं आशीर्वाद दूं । मैं न दूंगा । तुम कुएं में गिरो मजे से । लेकिन इसमें ध्‍यान रखना कि मैंने आशीर्वाद नही दिया । क्‍योंकि मैं इस पाप में क्‍यों भागीदार होऊं । मरो तुम । फंसू मैं । यह मैं न करूंगा । तुम जाओ । मजे से गिरो । लेकिन जिस दिन तुम्‍हें पता चल जाये कि कुएं में गिर गई हो । और अगर बच सकी हो । तो मुझे खबर जरूर कर देना ।
5 - 7 साल बीत गए । मुझे याद भी नहीं रहा । उस महिला का क्‍या हुआ । क्‍या नहीं हुआ । पिछले वक्‍त बंबई में बोल रहा था सभा में । तो वह उठकर आयी । और उसने मुझे आकर कहा । आपने जो कहा । वह घटना हो गयी है । तो मैं कब आकर पूरी बात बजा जाऊं । लेकिन कृपा करके किसी और को मत बताना । मैंने कहा । क्‍यों ? उसने कहा । वह भी मैं कल बताऊंगी । वह कल आयी । उसने कहा । अब बड़ी मुश्‍किल हो गयी । जिन ताबीजों को आकाश से निकालते देखकर मैं प्रभावित हुई थी । अब मैं उन्‍हीं संत की प्राइवेट सेकेट्री हो गई हूं । अब मैं उन्‍हीं के ताबीज बाजार से खरीद कर लाती हूं । बिस्‍तर के नीचे छिपा आती हूं । प्रगट होने का सब राज पता हो गया है । अब मैं भी प्रगट कर सकती हूं । लेकिन बड़ी मुशिकल में पड़ गयी हूं । उसी चमत्‍कार से तो हम आये भी । अब वह चमत्‍कार सब खत्‍म हो गया है । अब मैं क्‍या करूं ? अब मैं छोड़कर आ जाऊं । तो उसमें तो और भी मुश्‍किल है ।
कालेज में नौकरी करती थी । मुझे 700 रूपये मिलते थे । अब मुझे कोई दो - 2500 रूपये को फायदा । महीने का होगा । और इतने रूपये आते है मेरे पास कि जितने उसमें से उड़ा दूं । वह अलग है । उसका कोई हिसाब नहीं है । इसलिए मैं आ तो नहीं सकती । इसलिए मैं आपको कहती हूं । कृपा करके किसी और को मत कह देना । अब मेरी काम अच्‍छा चल रहा है । नौकरी है । लेकिन अब तो चमत्‍कार वह अध्‍यात्‍म का कोई लेना देना नहीं है । तो इसलिए पता न चल जाय । वह सारा त्‍याग चल रहा है । ज्ञान पता है । प्रगट होने को उत्‍सुक होता है । बेइमानी सदा अप्रकट रहना चाहती है । ज्ञान सदा खुलता है । बेईमानी सदा छिपाती है । नहीं । कोई मिरेकल जैसी चीज दुनिया में नहीं होती । न हो सकती है । और अगर होती होगी । तो पीछे जरूर कारण होगा । यह हो सकता है । और अगर होती होगी । तो पीछे जरूर करण होगा । यह हो सकता है । आज कारण न खोजा जा सके । कल खोज लिया जायेगा । परसों खोज लिया जायेगा । 
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