शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

वे तीरथराम से स्वामी रामतीर्थ हो गये



स्वामी रामतीर्थ का जन्म पंजाब के मुरलीवाला ग्राम के निवासी पण्डित हीरानंद के परिवार में सन 1873 ई. में दीवाली के दिन हुआ । इनके बचपन का नाम तीरथराम था । इनके जन्म के कुछ दिन बाद ही माता का देहान्त हो गया । तब इनका पालन पोषण इनकी बुआ ने किया । ये बचपन से ही बेहद कमजोर थे । पांच वर्ष की आयु में इनकी पडाई शुरू हो गयी । और इन्होंने प्राथमिक स्तर पर फारसी की शिक्षा प्राप्त की । 10 वर्ष की आयु तक प्राथमिक शिक्षा पूरी करके इनका इसी आयु में विवाह हो गया । और इसके बाद आगे की पढाई के लिए तीरथराम गुजरांवाला गये । वहां इनके पिता के मित्र धन्नाराम रहते थे । उन्हीं के यहां रहकर तीरथराम की पढाई हुयी । 14 वर्ष की आयु में तीरथराम ने मैट्रिक परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया । तब उन्हें राज्य की ओर से छात्रवृत्ति दी गयी । फ़िर आगे की पढाई के लिए तीरथराम लाहौर गये । इनके पिता की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी । वे तीरथराम को आगे पढाने में असमर्थ थे । तब तीरथराम ने छात्रवृत्ति के सहारे ही आगे पढने का निर्णय लिया । उनकी पडाई में अनेक विघ्न आये । पर तीरथराम अपने दृण संकल्प से सारी बाधाओं को पार कर गये । उन्होंने इण्टरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की । जीवन की भीषण परिस्थितियां तीरथराम के धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा पर परीक्षा लिए जा रही थी । उनके पिताजी तीरथराम की पत्नी को उनके पास छोड गये । पहले तो अपने ही खाने की समस्या थी । अब पत्नी की और हो गयी । कभी कभी तो दोनों लोगों को भूखा तक रहना पडता था । तीरथराम नंगे पांव विद्यालय जाते थे । B A की परीक्षा में उन्हें संस्कृत और फारसी विषयों में तो बहुत अच्छे नम्बर मिले । पर english में वह फ़ेल हो गये । इसलिये पूरी परीक्षा में ही फ़ेल कर दिया गया । अब क्या होता ? कहीं से कोई सहारा भी नहीं था । तब उन्हें झंडूमल नाम के मिठाई वाले ने सहारा दिया । उसने तीरथराम के परिवार के लिये भोजन आवास आदि की व्यवस्था की । इस सहारे से तीरथराम का हौसला बडा । और अगले वर्ष उन्होने अपनी मेहनत से पूरे विश्वविद्यालय में B A परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया । इस समय तीरथराम की आयु 19 वर्ष की थी । तीरथराम ने लाहौर विश्वविद्यालय से ही गणित विषय में परास्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । इसके बाद वे सियालकोट में अमेरिकन मिशन द्वारा संचालित एक विद्यालय में शिक्षण कार्य करने लगे । तब उन्हें 80 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था । इसी समय उनकी पत्नी ने दो पुत्रों को जन्म दिया । जिनका नाम मदन गोस्वामी और ब्रह्मानन्द था । लेकिन कुछ समय बाद ही तीरथराम का मन संसार से उचट गया । और उनकी व्याकुलता दिनोंदिन बढती गयी । अंत में 25 वर्ष की आयु में नौकरी घर परिवार छोडकर तीरथराम ऋषिकेश के पास ब्रह्मपुरी में निवास करने लगे । कहा जाता है कि इसी स्थान पर तीरथराम को दिव्यज्ञान की प्राप्ति हुयी । 28 वर्ष की अवस्था में तीरथराम एक नया बदलाव हुआ । वे तीरथराम से स्वामी रामतीर्थ हो गये । और संन्यास भाव में आ गये । टेहरी के महाराज ने आपके ज्ञान से प्रभावित होकर आपको देश विदेश की यात्रा करने हेतु कहा । स्वामी रामतीर्थ जापान एवं अमेरिका की यात्रा पर गये । इन देशों में के लोगों को उन्होने भारत के महान प्राचीन ज्ञान से परिचित कराया । अमेरिका में स्वामी रामतीर्थ लगभग दो वर्षो तक रहे । विदेश यात्रा से लौटकर वे महाराज टेहरी के विशेष आग्रह पर टेहरी राज्य में गंगाजी के किनारे एक कुटी में निवास करने लगे । एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्वामी रामतीर्थ गंगास्नान हेतु गये । और स्नान करते हुये आगे बढते ही गये । और एक भंवर में फंस गये । वहीं उनकी जलसमाधि बन गयी । यह घटना 1906 की है । इस समय उनकी आयु मात्र 33 वर्ष की थी । वे हिंदी संस्कृत और फारसी के अच्छे कवि थे ।

1 टिप्पणी:

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

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